लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में तेरापंथ धर्मसंघ के नवमें अधिशास्ता, युगप्रधान, गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी का 30वां महाप्रयाण दिवस आध्यात्मिक रूप में समायोजित हुआ। एक ओर जहां जैन विश्व भारती परिसर में स्थित आचार्यश्री तुलसी की स्मारक स्थल पर कुछ समय ध्यान-जप आदि का प्रयोग हुआ तो वहीं मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान चतुर्विध धर्मसंघ ने अपने नवमाधिशास्ता के प्रति अपनी-अपनी विनयांजलि अर्पित की।
सर्वप्रथम वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रातःकाल की मंगल बेला में जैन विश्व भारती परिसर में स्थित अपने सुगुरु की स्मारक स्थल के निकट पधारे और वहां कुछ क्षण के लिए विराजमान हुए। आचार्यश्री के साथ साधु-साध्वियों की भी उपस्थिति रही। आचार्यश्री ने वहां कुछ देर तक ध्यान व जप आदि का प्रयोग किया। ज्ञातव्य है कि लाडनूं आचार्यश्री तुलसी की जन्मस्थली और कर्मभूमि भी रही है। आचार्यश्री तुलसी की मंगल कल्पना से आज यहां जैन विश्व भारती का विशाल परिसर भी विद्यमान है।
तदुपरान्त सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आगम में गुरु की सेवा करना, वृद्ध की सेवा करना परम सुख प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ाने वाला तत्त्व हो सकता है। आज एक गुरु से जुड़ा हुआ दिन है। परम पूजनीय, परम वंदनीय, परम श्रद्धेय गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी का आज 30वां महाप्रयाण दिवस है।
आदमी जन्म लेता है, जीवन जीता है और एक दिन अवसान को भी प्राप्त हो जाता है। जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त होना तो सामाय घटना है, किन्तु आदमी अपना जीवन कैसे जीता है, यह विशेष बात होती है। आचार्यश्री तुलसी का जन्म इस लाडनूं की धरा पर हुआ। वि.सं. 1971, कार्तिक शुक्ला द्वितीया को हुआ। लाडनूं में ही उन्होंने मुनित्व को स्वीकार किया था, जो आगे चलकर इस तेरापंथ धर्मसंघ के सम्राट बन गए। उनके जीवन में पुण्याई का भी योग था। उनका मुनि जीवन भी मानों गौरवपूर्ण रहा। आचार्यश्री कालूगणी ने उन्हें 22 वर्ष की अवस्था में ही युवाचार्य बना दिया। सबसे कम उम्र में युवाचार्य बनने वाले, सबसे कम उम्र में आचार्य बनने वाले और सबसे ज्यादा वर्ष तक आचार्य पद पर रहने वाले एकमात्र आचार्य हुए। धर्मसंघ ने एक युवा आचार्य को मानों कितना बहुमान दिया।
वे पहले आचार्य बने, जिन्होंने अपना चतुर्मास दिल्ली में किया। अणुव्रत के माध्यम से कितने-कितने लोग, राजनैतिक व्यक्तित्व उनके साथ लाडनूं तक आए थे। अणुव्रत के माध्यम से कितने-कितने लोगों से जुड़ाव हुआ। वे धर्मसंघ के प्रथम आचार्य थे, जिन्होंने कोलकाता तक की यात्रा की, दक्षिण भारत की भी यात्रा की। उन्होंने अपने रहते हुए ही आचार्य पद का विसर्जन कर अपने युवाचार्य को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। जिनकी सन्निधि में हम जैसे कितने ही शिष्यों को उनके निकट रहने का, उनके चरणस्पर्श का अवसर मिला था।
आज के दिन ही आचार्यश्री तुलसी का गंगाशहर में महाप्रयाण हो गया था। उनके समय में धर्मसंघ में कितने-कितने नवीन उन्मेष हुए। उनके समय में साध्वी समुदाय और श्राविका समुदाय को भी आगे बढ़ने का अवसर मिला। आज कितनी साध्वियां आगम कार्य से जुड़ी हुई हैं। आचार्यश्री तुलसी के प्रति मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं कि उनकी प्रेरणाओं के प्रति हम सभी ध्यान दें।
आचार्यश्री के मंगल पाथेय के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने भी गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी के जीवन प्रसंगों का वर्णन करते हुए अपनी भावांजलि अर्पित की। साध्वी स्तुतिप्रभाजी ने गीत का संगान किया। साध्वीवृंद ने गीत का संगान किया। संतवृंद ने भी सामूहिक गीत का संगान किया। मुनि श्रेयांसकुमारजी आदि संतों ने भी गीत का संगान किया। पारमार्थिक शिक्षण संस्था में प्रवेश करने वाली मुमुक्षु विधि कुण्डलिया ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री तुलसी के संसारपक्षीय परिवार की ओर से श्री राजेन्द्र खटेड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। इसके पूर्व आचार्यश्री के पदार्पण से पूर्व श्री प्रेम पाण्डेय, श्रीमती लीलादेवी सालेचा ने गीत का संगान किया। मुनि ध्यानमूर्तिजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं ने गीत का संगान किया। श्री केशुलाल बडाला व श्री अमरावसिंह दुगड़ ने गीत का संगान किया। मुनि विजयकुमारजी, मुनि तन्मयकुमारजी, साध्वी मुकुलयशाजी व साध्वी अर्हतप्रभाजी, साध्वी संघप्रभाजी ने अपने-अपने गीतों का संगान किया।













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