मुंबई:अपनी मंगलवाणी से जन-जन को लाभान्वित करने वाले, जन मानस को आध्यात्मिकता का अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को समुपस्थित जनता को भगवती सूत्र आगम के आधार पर भौतिक अनुकूलता और प्रतिकूलता प्राप्ति के सूत्रो व्याख्यायित किया। वहीं सृजनशील साहित्यकार आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में दो विख्यात साहित्यकारों को जैन विश्व भारती द्वारा आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार प्रदान किया। आचार्यश्री ने साहित्यकारद्वय को पावन प्रेरणा और मंगल आशीर्वाद भी प्रदान किया।
गुरुवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान तीर्थंकर समवसरण में समुपस्थित श्रद्धालुओं को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भगवती सूत्र पर आधारित पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि भगवती सूत्र में कर्मवाद के संदर्भ में बताया गया कि कर्मों का बंध किन कारणों से होता है। वेदनीय कर्मों के संदर्भ प्रश्न किया गया कि सातवेदनीय कर्म और असातवेदनीय कर्म के बंध और उदय के मूल में अनुकंपा तत्त्व है। प्राणी अपने जीवन में दुःख पाता है और सुख भी पाता है। जिस आदमी का शरीर निरोगी और स्वथ है, परिश्रमी है, शरीर में कोई बीमारी न हो, मनोज्ञ और अनुकूल खाद्य पदार्थों की उपलब्धता हो और भी भौतिक अनुकूलताएं उपलब्ध हैं तो मानना चाहिए कि उस व्यक्ति अथवा मनुष्य के सातवेदनीय कर्म का उदय है। सातवेदनीय कर्म का बंध दया और अनुकंपा की भावना से होता है। प्राण, भूत, जीव और सत्व के प्राणियों के प्रति अनुकंपा की भावना, उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं देना, किसी की शांति को भंग नहीं करने वाला सातवेदनीय कर्म का बंध करता है। इसके विपरित दुर्बल शरीर, शक्ति का अभाव, बीमारी से ग्रस्त होना असातवेदनीय कर्म के कारण होता है। प्राणी मात्र के प्रति दया/अनुकंपा की भावना नहीं रखने वाला, उन्हें प्रताड़ित करने अथवा जान से मारने वाला, उनको दुःख देने वाला, उन्हें रुलाने वाला असातवेदनीय कर्म का बंध करता है। असातवेदनीय कर्म के उदय के दौरान वह भौतिक प्रतिकूलताओं को प्राप्त करता है और दुःख भोगता है।
इससे मनुष्य को यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि किसी भी प्राणी मात्र को कष्ट देने से बचने का प्रयास करना चाहिए। किसी भी प्राणी की शांति, सुविधा में बाधा नहीं डालना चाहिए। सभी प्राणियों के प्रति अनुकंपा की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। किसी को शरीर से कष्ट न देना, किसी को रुलाना नहीं, द्वेष वश किसी को दुःखी नहीं बनाना तथा सभी प्राणियों के हित का चिंतन करने से सातवेदनीय कर्म का बंध होता जो भौतिक अनुकूलता/सुख प्रदान करने वाला होता है। प्राणियों के प्रति अनुकंपाशीलता सातवेदनीय कर्म का बंध कराने वाली व निर्दयता, निष्ठुरता असातवेदनीय कर्म का बंध कराने वाली है। आदमी को प्रयत्न पूर्वक असातवेदनीय कर्म के बंध से बचने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी द्वारा राजस्थानी भाषा में विरचित आचार्यश्री कालूगणी की जीवनगाथा ‘कालूयशोविलास’ का सरसशैली में वाचन क्रम को आगे बढ़ाया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने समुपस्थित जनता को उद्बोधित किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती द्वारा सूरजमल सुराणा चेरिटेबल ट्रस्ट, गुवाहाटी द्वारा प्रायोजित आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार समारोह का समायोजन किया गया। इसमें वर्ष 2020 के लिए साहित्यकार श्री नरेश शांडिल्य व 2021 के लिए डॉ. हरीश नवल को स्मृति चिन्ह व निर्धारित राशि जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों आदि द्वारा प्रदान की गई। इस संदर्भ में जैन विश्व भारती के महामंत्री श्री सलील लोढ़ा ने अवगति प्रस्तुत की। श्री सिद्धार्थ सुराणा व कवि श्री राजेश चेतन ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
मुनि दिनेश कुमार जी ने फरमाया की संतो द्वारा तुलसी पर गाई पंक्तियां _ मुझे है काम तुलसी से, जगत रूठे तो रूठने दो । गरहा अध्यात्म का मार्ग है ,गुरुदेव को निवेदन करने से परिणाम जरूर आएगा । ऐसे व्यक्ति, संत धर्म की शरण में हो उसे उसे संघ में शरण मिलनी चाहिए । अपने व्यतव्य , भावना और चतुर्विग्न अध्यात्म से गलती होने पर मुनि शांति कुमार जी स्वामी को गुरुदेव तुलसी ने तेरापंथ धर्म संघ में शामिल किया । फिर बाद में सेवा में लीन होकर संतो की सेवा, गुरुदेव की शरण में रहकर अंतिम सांस लेकर अपना एक अनूठा इतिहास बनाया । गुरु के प्रति, संघ के प्रति भावना होनी चाहिए, इससे व्यक्ति का कल्याण हो जाता है । निदान दो प्रकार के होते हे । 1. वस्तु संबंधी, 2. भव संबंधी – वस्तु संबंधी निदान में अगर कोई पत्नी अपने लिए पांच पति चाहिए की आस्था रखती है लेकिन यह लंबे समय तक नहीं होती है। पद संबंधी भावना रखने वाला व्यक्ति वासुदेव, राजा के पद का मन बना लिया वह वस्तु संबंधी पद का निदान हे। भव का मतलब भगवान का चक्रवती, राजा इत्यादि का मन भाव रखते है उसे भाव संबंधी निदान का प्रकार बताया । चक्रवती बनकर साधु बनने का भाव बन जाए तो उनको मोक्ष गति निदान मार्ग में जाते है । समंदर कभी मांग नहीं करता, नदिया स्वतः आकर उसने विलय होती है यह प्रकार स्वत: ही बनता है । बलदेव और तीर्थंकर कभी भी निदान करके बनते, चक्रवती और वासुदेव निदान कर ही बनते है । अतिक्रमण करता वही अतिचार का कर्म है , मोहनिया कर्म करने से अतिचार का कर्म प्रायश्चित करने पर दूर होता है । पंचांग वंदना करना विशेष प्रावधान है , अष्टांग वंदना भी समान होती हे लेकिन यह सो कर की गई वंदना होती हे । भावना के आधार पर व्यक्ति कर्मो की निर्जरा कर लेता है। *उपाध्याय जी दो झिखारो , मारो अभिवादन स्वीकारों। पांचों अंग नमत प्रभु चरणों में, इसमें तुलसी बने सहारो, म्हारी वंदना स्वीकारों…………
पुरस्कार प्राप्त करने के उपरान्त साहित्यकार डॉ. नरेश शांडिल्य ने कहा कि मुझे अनेकों पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए हैं, किन्तु आज आचार्यश्री महाश्रमणजी के समक्ष आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार प्राप्त कर स्वयं को गौरवान्वित और गदगद महसूस कर रहा हूं। डॉ. हरीश नवल ने कहा कि मेरे जीवन का यह क्षण अनमोल है। मैं ऐसे महासंत के समक्ष सम्मानित होकर स्वयं को कृतार्थ महसूस कर रहा हूं।
आचार्यश्री ने इस मौके पर मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिभा और चेतना का विकास ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से होता है। परम पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने साहित्य जगत को कितना अवदान दिया है। जैन विश्व भारती ज्ञान के प्रचार, प्रसार और प्रकाश का कार्य कर रही है। साहित्यकार होना भी बड़ी बात होती है। दोनों पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं के प्रति मंगलकामना है कि वे अध्यात्म की दिशा में गति-प्रगति करते रहें। आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त कर साहित्यकारद्वय अतिशय आह्लाद की अनुभूति कर रहे थे।













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