जयपुर : निर्माण नगर स्थित स्थानीय स्कूल के संबोधि सभागार में आयोजित प्रवचन सभा में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने आगम शास्त्र के आधार पर जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक सत्य को सरल रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संसार में चार ऐसे तत्व हैं जिनका संयोग अत्यंत दुर्लभ है—मनुष्य जन्म, धर्म का श्रवण, धर्म में श्रद्धा और धर्माचरण। इन चारों का मिलना ही आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि यदि इन चारों में से एक भी तत्व की कमी रह जाए तो जीवन की आध्यात्मिक उपलब्धि अधूरी रह जाती है। उन्होंने कहा कि परम तत्त्व या मोक्ष की प्राप्ति तभी संभव है जब यह चारों योग एक साथ साधक के जीवन में उपस्थित हों।
जीवन की तीन प्रवृत्तियाँ: उत्तम, मध्यम और अधम
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने मानव स्वभाव के आधार पर तीन प्रकार की प्रवृत्तियों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि संसार में सामान्यतः तीन प्रकार के मनुष्य पाए जाते हैं—उत्तम, मध्यम और अधम।
अधम प्रवृत्ति के व्यक्ति वे होते हैं जो दूसरों के अधिकारों को हड़पने का प्रयास करते हैं और अपनी वस्तु के साथ-साथ परायी वस्तु को भी अपनी बताकर अनुचित लाभ उठाते हैं।
मध्यम श्रेणी के व्यक्ति अपनी वस्तु को अपना और परायी वस्तु को परायी मानते हैं। वे दूसरों के अधिकारों का हनन तो नहीं करते, किंतु पूर्ण आत्मिक उन्नति की दिशा में भी आगे नहीं बढ़ पाते।
वहीं उत्तम प्रकृति के मनुष्य अत्यंत उच्च चेतना वाले होते हैं। वे अनासक्त भाव से जीवन जीते हैं और परोपकार को प्राथमिकता देते हुए अपने हित को भी गौण कर देते हैं।
सज्जनता का वास्तविक अर्थ
मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सज्जन वही है जो दुर्जनता का उत्तर भी कल्याणकारी भाव से देता है। उन्होंने भगवान महावीर का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने कष्ट देने वाले संगम देव के प्रति भी करुणा और हित की भावना रखी।
कार्यक्रम का आरंभ
कार्यक्रम की शुरुआत तीर्थंकर शांतिनाथ प्रभु की स्तुति से हुई। इसके बाद उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेक्षाध्यान का अभ्यास भी कराया गया, जिससे वातावरण में गहन आध्यात्मिक शांति और एकाग्रता का अनुभव हुआ।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं धर्मप्रेमी उपस्थित रहे और प्रवचनों का श्रवण कर आत्मिक प्रेरणा प्राप्त की।












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