भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिशें अपने निर्णायक चरण में हैं। ऐसे समय में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) द्वारा भारत सहित 54 देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव सामने आना केवल एक व्यापारिक कदम नहीं माना जा सकता। इसकी टाइमिंग स्वयं कई प्रश्न खड़े करती है। क्या यह वास्तव में बंधुआ मजदूरी से जुड़े वैश्विक मानकों को लागू करने का प्रयास है, या फिर व्यापार वार्ता की मेज पर दबाव बढ़ाने की एक रणनीति?
अमेरिका का तर्क है कि जिन देशों ने बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रभावी रोक नहीं लगाई है, वे वैश्विक बाजार में अनुचित प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रहे हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर का कहना है कि इससे अमेरिकी श्रमिकों के हित प्रभावित होते हैं और समान अवसरों वाला व्यापारिक वातावरण कमजोर पड़ता है। यह तर्क अपने आप में महत्व रखता है, क्योंकि आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में श्रमिक अधिकारों और मानवाधिकारों को व्यापार से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
किन्तु प्रश्न यह भी है कि क्या ऐसे मामलों का समाधान एकतरफा शुल्कों के माध्यम से किया जाना चाहिए? विशेषकर तब, जब संबंधित देशों के साथ व्यापक व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही हो। भारत ने उचित ही यह कहा है कि इस प्रकार के विवादों का समाधान संवाद और द्विपक्षीय वार्ता के ढांचे के भीतर होना चाहिए। यदि हर व्यापारिक असहमति का उत्तर अतिरिक्त शुल्कों में खोजा जाएगा, तो मुक्त और निष्पक्ष व्यापार व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
धारा-301 के अंतर्गत कार्रवाई करना अमेरिका के लिए नया नहीं है। अतीत में भी इस प्रावधान का उपयोग विभिन्न देशों के विरुद्ध किया जाता रहा है। किंतु आलोचक लंबे समय से यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि क्या यह व्यवस्था कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों से अधिक अमेरिकी रणनीतिक हितों का उपकरण बन जाती है। वर्तमान प्रस्ताव ने इस बहस को एक बार फिर जीवित कर दिया है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि जिन 54 देशों का नाम इस सूची में शामिल है, उनमें केवल विकासशील अर्थव्यवस्थाएं ही नहीं, बल्कि जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और सऊदी अरब जैसे अमेरिका के घनिष्ठ साझेदार भी शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका इस मुद्दे को व्यापक वैश्विक मानक के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। फिर भी यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि प्रस्ताव ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और अमेरिका अपने आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में प्रयासरत हैं।
भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों है। चुनौती इसलिए कि यदि शुल्क लागू होते हैं तो कुछ निर्यात क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। अवसर इसलिए कि भारत अपनी श्रम नीतियों, आपूर्ति श्रृंखला की पारदर्शिता और व्यापारिक मानकों को लेकर अपने पक्ष को और अधिक मजबूती से दुनिया के सामने रख सकता है।
अंततः यह विवाद केवल शुल्कों का नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है कि क्या वैश्विक व्यापार सहयोग और संवाद के आधार पर आगे बढ़ेगा या फिर आर्थिक शक्ति के प्रदर्शन और दबाव की राजनीति के माध्यम से संचालित होगा। आने वाले सप्ताहों में होने वाली सार्वजनिक सुनवाई और भारत-अमेरिका वार्ताएं इस प्रश्न का उत्तर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत