बात 1997 की है। केंद्र में जनता दल की अगुवाई वाली यूनाइटेड फ्रंट की सरकार थी। इंदर कुमार गुजराल प्रधानमंत्री थे। जनता दल के अध्यक्ष पद के चुनाव में दो दोस्तों में ठन गई थी। एक तरफ शरद यादव थे तो दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे। जब जनता दल के अध्यक्ष पद का चुनाव हो रहा था, तभी लालू प्रसाद यादव ने उसका बहिष्कार करते हुए पार्टी के 22 सांसदों संग विद्रोह कर दिया था और अपनी नई पार्टी बना ली थी। उस वक्त लालू यादव पर चारा घोटाले की वजह से गिरफ्तारी की तलवार लटक रही थी और सीएम की कुर्सी पर भी खतरा मंडरा रहा था।
पार्टी को बताया था सांपों से भरा
लालू यादव ने जनता दल अध्यक्ष पद के चुनाव के दो दिन बाद ही यानी 5 जुलाई 1997 को नई दिल्ली में अपने वफादारों संग एक राष्ट्रीय सम्मेलन में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के गठन की घोषणा करते हुए कहा था, “जिस जनता दल को मैंने इतने वर्षों में कड़ी मेहनत से बनाया, खड़ा किया और नेतृत्व किया, वह सांपों से भरा हुआ है, जो मेरे खिलाफ साजिश रच रहे हैं।”
तीन केंद्रीय मंत्रियों ने दिया था लालू का साथ
उस सम्मेलन में लगभग 2,000 पार्टी प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इनमें से अधिकांश बिहार से थे। इसी सम्मेलन में लालू यादव को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चुनने का एक प्रस्ताव भी पारित किया गया था। उस बैठक में 16 लोकसभा सांसदों और 6 राज्यसभा सांसदों (लालू के समर्थक सांसद) ने भाग लिया था। उनमें तीन केंद्रीय मंत्री- कोयला मंत्री कांति सिंह, गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री रघुबंश प्रसाद सिंह भी मौजूद थे।
रामचंद्र पूर्वे ने पार्टी नाम का रखा था प्रस्ताव
बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री रामचंद्र पूर्वे ने पार्टी का नाम ‘राष्ट्रीय जनता दल’ का प्रस्ताव रखा था। उस दिन नव निर्मित बिहार भवन के लॉन में एकत्र हुए पार्टी कार्यकर्ताओं ने लालू यादव को “दलितों और जनता का नेता” बताते हुए खूब तालियां बजाईं थीं और उनके समर्थन में नारे लगाए थे। तब लालू यादव ने दावा किया था कि उनका गुट ही असली जनता दल है क्योंकि पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ताओं ने 3 जुलाई 1997 को जनता दल के अध्यक्ष चुनाव में भाग लेने से इनकार कर दिया था।
पशोपेश में थी 74 दिन पुरानी गुजराल सरकार
उस वक्त जनता दल के लोकसभा में 45 सांसद थे। उनमें से 16 लालू के पक्ष में आ चुके थे। सिर्फ 29 ही मूल जनता दल में बचे रह गए थे। तब बिहार से 16 लोकसभा सदस्यों और कर्नाटक से छह लोकसभा सांसदों और नौ राज्यसभा सदस्यों ने भी जनता दल के आंतरिक चुनाव का बहिष्कार किया था। बिहार में 146 प्रतिनिधियों में से केवल 33 ने ही वोट डाले थे।
जनता दल में विद्रोह और फूट से पीएम गुजराल भी सशंकित थे कि अगर लालू ने सरकार से समर्थन खींचा तो मुश्किल हो सकती है लेकिन तब लालू ने साफ कर दिया था कि उनकी पार्टी गुजराल सरकार को नहीं छोड़ेगी। उस वक्त गुजराल सरकार को सिर्फ 74 दिन ही हुए थे।
एचडी देवगौड़ा पर बरसे थे लालू यादव
अधिवेशन में लालू यादव ने साफ-साफ कहा था, “मैंने कल प्रधानमंत्री गुजराल से मुलाकात की और उन्हें बताया कि हम यूनाइटेड फ्रंट सरकार का हिस्सा होंगे। हम गुजराल के नेतृत्व और गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम को स्वीकार करते हैं।” लेकिन उसी सभा में लालू ने पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा पर ताबड़तोड़ हमले किए थे और उन्हें ही शरद यादव के साथ हुई लड़ाई का मास्टरमाइंड बताया था।













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