डेस्क : भारत में प्रस्तावित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण चेतावनी सामने आई है। ज्यूरिख समूह की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक देश में नियोजित लगभग 90 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा स्थल उच्च या गंभीर स्तर के भौतिक जलवायु जोखिम की चपेट में हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार यदि अभी से कदम उठाए जाएँ तो कम लागत में ही इन परियोजनाओं में मजबूती और सुरक्षा को शामिल किया जा सकता है।
रिपोर्ट में दस राज्यों के कुल 871 प्रस्तावित ऊर्जा स्थलों का विश्लेषण किया गया, जिनकी संयुक्त क्षमता लगभग 267 गीगावाट बताई गई है। इसमें पाया गया कि वर्ष 2030 तक लगभग 66 प्रतिशत परियोजनाएँ गंभीर जोखिम श्रेणी में आ सकती हैं। रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह स्थिति घबराने के लिए नहीं, बल्कि तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता को दर्शाती है।
ऊर्जा मिश्रण के अनुसार सौर ऊर्जा इस पूरे पाइपलाइन में सबसे प्रमुख है। कुल परियोजनाओं में 593 स्थल सौर ऊर्जा से जुड़े हैं, जिनकी क्षमता लगभग 182,286 मेगावाट है, जो कुल अनुमानित क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत है। पवन ऊर्जा के तहत 230 स्थल और 44,177 मेगावाट क्षमता शामिल है। वहीं जलविद्युत परियोजनाएँ संख्या में कम यानी 48 स्थल हैं, लेकिन उनकी संयुक्त क्षमता 40,188 मेगावाट है, और पूंजीगत लागत अधिक होने के कारण इनमें वित्तीय जोखिम अपेक्षाकृत अधिक माना गया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इन परियोजनाओं के सामने प्रमुख प्राकृतिक खतरे में तूफान, बवंडर, बाढ़, जंगल की आग और ओलावृष्टि शामिल हैं। सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ओलावृष्टि विशेष रूप से खतरनाक है, क्योंकि यह पैनलों के शीशे को सीधे नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ ऐसे सूक्ष्म दोष भी उत्पन्न कर सकती है, जो बाद में उत्पादन क्षमता में गिरावट के रूप में सामने आते हैं।
पवन ऊर्जा परियोजनाएँ अत्यधिक तेज हवाओं, बाढ़ और बदलते मानसूनी तथा चक्रवाती पैटर्न से प्रभावित हो सकती हैं। वहीं जलविद्युत परियोजनाओं के लिए रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐतिहासिक जलविज्ञान भविष्य की परिस्थितियों का विश्वसनीय आधार नहीं रह गया है, इसलिए नई परिस्थितियों के अनुरूप योजना आवश्यक है।
रिपोर्ट में जोखिम कम करने के लिए पाँच प्रमुख सुझाव दिए गए हैं। इनमें परियोजना योजना के चरण में ही जलवायु जोखिम आकलन को अनिवार्य बनाना, सबसे अधिक जोखिम वाले परिसंपत्तियों की प्राथमिकता के आधार पर जांच करना, खरीद प्रक्रिया में जोखिम-विशिष्ट सुरक्षा उपाय शामिल करना, प्रणालीगत और परिसंपत्ति दोनों स्तरों पर मजबूती सुनिश्चित करना तथा वित्तीय निवेश आकर्षित करने के लिए जोखिम की गणना और पारदर्शिता बढ़ाना शामिल है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि कुल पूंजीगत व्यय का लगभग दो प्रतिशत हिस्सा जोखिम-रोधी उपायों पर खर्च किया जाए, तो गंभीर नुकसान की संभावना लगभग 75 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। इससे अनुमानित रूप से नुकसान से बचाव का लाभ लगभग 38 गुना तक हो सकता है।
एक उदाहरण के रूप में 2.5 गीगावाट की एक सौर परियोजना का उल्लेख किया गया है। इसमें बिना सुरक्षा उपायों के स्थिति में संभावित नुकसान लगभग 178.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर आंका गया, जबकि ओलावृष्टि-रोधी ट्रैकर प्रणाली लगाने पर यह नुकसान घटकर लगभग 43 मिलियन डॉलर रह गया। हालांकि इसके लिए लागत में लगभग 34 मिलियन डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई, जो एक स्थिर संरचना प्रणाली की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि परियोजना डिजाइन के चरण में ही यदि मजबूती और सुरक्षा को शामिल किया जाए, तो यह अतिरिक्त लागत नहीं बल्कि ऐसे निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए जो भविष्य में परियोजनाओं को अधिक बैंक योग्य, बीमा योग्य और टिकाऊ बनाता है।













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