मध्य-पूर्व में भड़के संघर्ष और उसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था गंभीर संकट में आ गई। यह समुद्री मार्ग विश्व के कुल कच्चे तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा वहन करता है। बंदी के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल आपूर्ति बाधित हो गई और कीमतों में तीव्र उछाल देखने को मिला।
रिपोर्टों के अनुसार, फरवरी के अंत में अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद तेहरान ने होर्मुज को पूरी तरह बंद कर दिया। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला चरमरा गई और कई देशों में ईंधन संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई।
भारत पर संभावित खतरा और वास्तविक परिणाम
भारत अपनी कच्चे तेल आवश्यकताओं का लगभग नब्बे प्रतिशत और एलपीजी का लगभग साठ प्रतिशत आयात करता है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर आता है। ऐसे में आशंका थी कि यह संकट भारत की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।
हालाँकि चार महीने लंबे इस संकट के दौरान स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रित रही। पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें नहीं लगीं, एलपीजी की आपूर्ति बाधित नहीं हुई और आर्थिक गतिविधियाँ सामान्य रूप से चलती रहीं।
तेल कीमतों में ऐतिहासिक उछाल
संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय कच्चा तेल सौ डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया। कुछ ही सप्ताह में भारतीय बास्केट का कच्चा तेल सत्तर डॉलर से बढ़कर एक सौ बीस डॉलर प्रति बैरल से अधिक पहुँच गया। ब्रेंट क्रूड एक सौ छब्बीस डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुँच गया।
एलपीजी अनुबंध कीमतों में भी लगभग छियालीस प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे आयात लागत में भारी बढ़ोतरी हुई। युद्ध-जोखिम बीमा दरों में वृद्धि ने स्थिति को और कठिन बना दिया।
भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया
संकट की शुरुआत के साथ ही सरकार ने त्वरित और कठोर नीतिगत कदम उठाए। आपूर्ति व्यवस्था को स्थिर रखने के लिए घरेलू उत्पादन को बढ़ाया गया और आपूर्ति श्रृंखला को सक्रिय किया गया।
सरकार ने निर्णय लिया कि बढ़ी हुई लागत का सीधा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाएगा, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की विपणन कंपनियाँ इसे वहन करेंगी। इसके साथ ही उत्पाद शुल्क में कटौती कर राहत देने का प्रयास किया गया।
ऊर्जा कूटनीति के तहत वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों का तेजी से विस्तार किया गया और मांग प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया।
पिछले दशक के सुधारों का प्रभाव
पिछले दस वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किए गए निवेश इस संकट में निर्णायक सिद्ध हुए।
एलपीजी आयात टर्मिनलों की संख्या ग्यारह से बढ़कर बाईस हो गई। आयात क्षमता बारह मिलियन टन से बढ़कर बत्तीस मिलियन टन से अधिक पहुँच गई।
तेल आपूर्ति स्रोतों का विस्तार भी उल्लेखनीय रहा। जहाँ पहले भारत सत्ताईस देशों से तेल आयात करता था, वहीं अब यह संख्या इकतालीस देशों तक पहुँच गई है। नए आपूर्तिकर्ताओं के जुड़ने और पारंपरिक स्रोतों से बढ़ते आयात ने निर्भरता को संतुलित किया।
एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने भी कच्चे तेल आयात में उल्लेखनीय कमी लाकर संरचनात्मक मजबूती प्रदान की।
आर्थिक दबाव और सरकारी हस्तक्षेप
दो माह से अधिक समय तक कीमतों को स्थिर रखने के बाद अंततः पेट्रोल और डीजल के दामों में प्रति लीटर सात रुपये तक की वृद्धि हुई।
तेल विपणन कंपनियों को भारी दैनिक घाटा उठाना पड़ा, जो कई सौ करोड़ रुपये प्रतिदिन तक पहुँच गया। वहीं सरकार को उत्पाद शुल्क में कटौती के कारण बड़े राजस्व त्याग का सामना करना पड़ा।
तेल और गैस कंपनियों पर भी भारी वित्तीय दबाव बना रहा, हालांकि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में स्थिरता आने से राहत की उम्मीद जताई गई।
अन्य देशों की स्थिति बनाम भारत की नीति
इस संकट से प्रभावित अन्य देशों में स्थिति कहीं अधिक गंभीर रही। कई एशियाई देशों में ईंधन राशनिंग लागू करनी पड़ी, सरकारी कामकाज सीमित किए गए और सार्वजनिक सेवाओं पर प्रभाव पड़ा।
इसके विपरीत भारत ने न तो आपातकाल घोषित किया, न ही राशनिंग लागू की और न ही कार्य दिवसों में कटौती की। केवल कुछ निर्यात प्रतिबंधों के माध्यम से घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखा गया।
आर्थिक संकेतकों में स्थिरता
संकट काल के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ऐतिहासिक स्तर पर मजबूत बना रहा। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर लगभग सात प्रतिशत के आसपास बनी रही।
चालू खाता घाटा नियंत्रित रहा और मुद्रास्फीति भी केंद्रीय बैंक के लक्ष्य सीमा के भीतर रही। यह संकेत देता है कि बाहरी झटकों के बावजूद आर्थिक ढांचा स्थिर बना रहा।
होर्मुज खुलने के बाद की स्थिति
जून में शांति समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य पुनः खुल गया। इसके साथ ही वैश्विक तेल आपूर्ति में सुधार हुआ और कीमतें गिरकर लगभग चौहत्तर डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गईं।
भारत के रणनीतिक भंडार और आपूर्ति श्रृंखला अब भी मजबूत स्थिति में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ तथा लचीला बनाया है, जिससे भविष्य के किसी भी वैश्विक झटके का सामना बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।













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