डेस्क:प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शक्तियों को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि एजेंसी कानून से ऊपर नहीं है और इसे ‘सुपर कॉप’ या ‘मनमाने तरीके से कार्रवाई करने वाले ड्रोन’ की तरह नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत ईडी की कार्रवाइयों की एक स्पष्ट कानूनी रूपरेखा है, जिसका पालन अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति एमएस रामेश और वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी आरकेएम पावरजेन प्राइवेट लिमिटेड की 901 करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट को फ्रीज करने संबंधी ईडी के आदेश को रद्द करते हुए दी। अदालत ने दो टूक कहा कि जब तक कोई ‘प्रीडिकेट ऑफेंस’ यानी मूल अपराध और उससे प्राप्त ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ यानी अपराध से अर्जित संपत्ति का प्रमाण न हो, तब तक ईडी पीएमएलए के तहत कार्रवाई नहीं कर सकती।
कोर्ट ने ईडी की शक्तियों की तुलना ‘लिम्पेट माइन’ से की—जो बिना जहाज के काम नहीं कर सकती। यहां जहाज का प्रतीक उस अपराध और उससे जुड़ी आय से है, जिनके बिना पीएमएलए लागू नहीं हो सकता।
2006 से शुरू हुई थी पावर ब्लॉक की कहानी
आरकेएम पावरजेन को 2006 में फतेहपुर ईस्ट कोल ब्लॉक आवंटित किया गया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में रद्द कर दिया। इस मामले में सीबीआई ने एक एफआईआर दर्ज की, लेकिन 2017 में उसे बंद कर दिया गया। बावजूद इसके, ईडी ने 2015 में पीएमएलए के तहत जांच शुरू कर दी और कंपनी के बैंक खाते फ्रीज कर दिए।
कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बी. कुमार ने तर्क दिया कि ईडी ने पूर्ववर्ती अदालती निर्णयों की अनदेखी करते हुए और ठोस सबूतों के अभाव में यह कार्रवाई की, जो पूरी तरह अवैध है।
कोर्ट ने ईडी की कार्रवाई को बताया ‘कानून के विरुद्ध’
मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले में ईडी की कार्रवाई को “कानूनी रूप से अस्वीकार्य” करार दिया और कहा कि किसी भी एजेंसी को कानून से परे जाकर काम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ईडी जैसी एजेंसियों को, चाहे वे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हों, तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना ही होगा।
इस फैसले को ईडी की शक्तियों पर लगाम लगाने के एक बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, खासतौर पर तब, जब जांच एजेंसी पर हाल के वर्षों में राजनीतिक पक्षपात और मनमानी के आरोप लगते रहे हैं।













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