कोबा, गांधीनगर (गुजरात) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्ष 2025 का चतुर्मास कोबा में स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में अपनी धवल सेना के साथ सुसम्पन्न कर रहे हैं। धीरे-धीरे इस चतुर्मास की सुसम्पन्नता की तिथि भी मानों निकट होती जा रही है। अहमदाबादवासी अब मन ही मन यह प्रार्थना करने लगे हैं कि यह समय कुछ दिन के लिए और ठहर क्यों नहीं जाता, मानों उन्हंे अहसास ही नहीं हुआ कि कब चतुर्मासकाल के तीन महीने से अधिक का समय बीत गया। नित्य अपने आराध्य की सेवा-उपासना में जुटे श्रद्धालुओं को यह चतुर्मासकाल का समय भी मानों स्वल्प-सा प्रतीत हुआ और उनकी आध्यात्मिक प्यास बुझने की जगह और बढ़ गई। शुक्रवार को मंगल प्रवचन से पूर्व युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान चतुर्मास परिसर के कई स्थानों पर स्थित व्यवस्थाओं का अवलोकन किया। इस दौरान आचार्यश्री ने निर्धारित व्यवस्थाओं से जुड़े हुए श्रद्धालुओं को मंगल प्रेरणा के साथ पावन आशीर्वाद भी प्रदान किया। अपने आराध्य को अपने समक्ष पाकर चतुर्मास व्यवस्थाओं से जुड़े हुए श्रद्धालु अत्यंत हर्षित नजर आ रहे थे। इस प्रकार चतुर्मास परिसर में भ्रमण व भक्तों पर कृपा बरसाने के उपरान्त आचार्यश्री पुनः प्रवास स्थल में लौटे।
प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन के लिए शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में पधारे व समुपस्थित जनमेदिनी को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि आयारो आगम में कहा गया है कि पूरा आकाश अनंत है। कोई पूछे कि आकाश का प्रारम्भ कहां से हुआ है तो उसका न कोई प्रारम्भ और अंत भी नहीं है, इसलिए आकाश अनंत है। आकाश के दो विभाग होते हैं-लोकाकाश व अलोकाकाश। जैनिज्म के समान अनंत आकाश के मध्य एक छोटे-से बूंद की भांति है। जितने भी प्राणी, जीव, सिद्ध भगवान आदि और जितनी भी प्रकृति है, सबकुछ इसी लोकाकाश में रहता है। अनंत आकाश में कुछ नहीं सिवाय शून्य के। शास्त्र में बताया गया है कि लोक में महान भय है। सारा दुःख इसी लोक में है। प्राणियों को दुःख भी होता है और उन्हें भय भी लगता है।
प्राणियों को दुःख का भी भय भी लगता है। इस कारण प्राणियों में भय भी होता है। किसी को अपमान का भय, किसी को दूसरे जीव-जन्तुओं से भय है। किसी को कभी-कभी भूत-प्रेत से भी भय की बात सामने आती है। किसी बात को लेकर, किसी स्थान आदि के विषय में जानकर भी भय महसूस हो सकता है। भय अनेक रूपों में हो सकता है। आदमी को किसी के साथ भी वैर भाव नहीं पालना चाहिए। आदमी को स्वयं के द्वारा किसी दूसरे का नुक्सान पहुंचने से बचने का प्रयास होना चाहिए। ऐसी अहिंसक चेतना का विकास और अभय की आराधना और साधना करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री तुलसी शांति प्रतिष्ठान गंगाशहर (नैतिकता का शक्तिपीठ) की ओर से श्री दीपक आंचलिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। बालक निधान दूगड़ ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी।












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