कंटालिया, पाली: आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष का महाचरण महामना आचार्यश्री भिक्षु की जन्मस्थली कंटालिया में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
शुक्रवार को महाचरण का पांचवां दिवस था। कंटालिया के रावले में बने भव्य एवं विशाल प्रवचन पण्डाल में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ की विशाल उपस्थिति भी थी। युगप्रधान आचार्यश्री के मंचासीन होते हुए पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार से आज के कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। मुनि नम्रकुमारजी ने गीत का संगान किया। आज के निर्धारित ‘आचार्य भिक्षु और धर्मक्रांति’ विषय पर मुनि कुमारश्रमणजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
तदुपरान्त युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि अहिंसा, संयम और तप के रूप में धर्म को व्याख्यायित किया गया है। धर्म अपने आप में बहुत शुद्ध तत्त्व है। धर्म जब शुद्ध है तो उसमें क्रांति की कहां अपेक्षा होती है। इसी प्रकार अहिंसा, संयम और तपस्या रूपी धर्म में क्रांति की कहां अपेक्षा होती है। आज का विषय है- ‘आचार्य भिक्षु की धर्मक्रान्ति।’ धर्म के संदर्भ में क्रांति वहां अपेक्षित होती है, जहां धर्म का समूह होने पर भी यदि वे धर्म का पालन ठीक से नहीं कर रहा है, तो उस समय में धर्म क्रान्ति की अपेक्षा हो सकती है। जो धर्म स्वीकार किया है, उसका पालन ठीक नहीं होता तो उस संदर्भ में क्रांति की अपेक्षा हो सकती है। जहां धर्म का पालन सही ढंग से नहीं होता, वहां क्रांति की अपेक्षा होती है। धर्म की व्याख्या और आचार के संदर्भ में धर्म की क्रांति की जा सकती है। आचार्यश्री भिक्षु स्वामीजी ने व्याख्या और आचार के आधार पर क्रांति की।
अपने गृहस्थ जीवन में कषायों की शांति और अपने मन के भावनाओं पर नियंत्रण के लिए आचार्यश्री भिक्षु ने धर्मक्रांति की। जहां जरूरत हो, वहां क्रांति अपेक्षित हो सकती है, अथवा अनावश्यक अशांति में क्यों जाना। महामना की इस क्रांति में राजनगर के श्रावकों का भी योगदान था। इस क्रांति की पृष्ठभूमि में राजनगर के श्रावकों की क्रांति रही। क्रांति का उद्देश्य सही हो तो किसी कार्य में पुनः निर्मलता आ सकती है। भारत की आजादी के लिए भी क्रांति हुई तो उसे परत्रंता से मुक्ति मिल गई। संघर्ष को झेलने की ताकत जाग जाए तो फिर क्रांति सफलता को प्राप्त हो सकती है।
आचार्यश्री भिक्षु स्वामी में साहस और मनोबल था तो सफलता को प्राप्त किया जा सकता है। विरोध को झेलने की क्षमता का होना बड़ी बात होती है। आचार्यश्री भिक्षु की क्रांति में त्याग बोलता है। आचार और विचार की शुद्धता को ध्यान में रखते हुए की गई क्रांति कल्याणकारी हो सकती है। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त साधु-साध्वियों व समणियों को थोड़ा समय अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने अवसर प्रदान किया।
गुरुदर्शन करने के उपरान्त साध्वी कुन्दनप्रभाजी ने अपनी सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान करने के उपरान्त उन्होंने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुनि चैतन्यकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुनि सिद्धप्रज्ञजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। बेंगलुरु के सहमंत्री श्री नवरतनमल गादिया व श्रीमती लता कांकरिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री हितेश मरलेचा ने गीत को प्रस्तुति दी। राजस्थान शिक्षक संघ आजाद जिला शाखा पाली के जिलाध्यक्ष श्री घनश्याम सैन ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने संघ से जुड़े हुए लोगों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।












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