डेस्क :अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही खुद को वैश्विक राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बताने में लगे हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इससे सहमत नहीं दिखते। राजनीतिक विश्लेषक इयन ब्रेमर का मानना है कि मौजूदा दौर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ट्रंप की तुलना में कहीं अधिक मज़बूत स्थिति में हैं।
इंडिया टुडे से बातचीत में ब्रेमर ने कहा कि अमेरिका आज भी दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसका राष्ट्रपति भी सबसे ताकतवर नेता हो। उनके शब्दों में, “राष्ट्रपति ट्रंप सबसे ताकतवर नेता नहीं हैं। यह स्थान शी जिनपिंग के पास है।”
ब्रेमर ने इसके पीछे ठोस कारण गिनाए। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग पर न तो मिडटर्म चुनावों का दबाव है और न ही स्वतंत्र न्यायपालिका जैसी संस्थागत सीमाएं। इसके विपरीत, ट्रंप का कार्यकाल सीमित है और वे अधिकतम कुछ वर्षों तक ही सत्ता में रह सकते हैं, जबकि जिनपिंग लंबे समय तक शासन में बने रह सकते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि जब ट्रंप सुर्खियों और बयानबाज़ी में व्यस्त रहते हैं, उसी दौरान शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी रणनीतिक रूप से अधिक स्थिर और मज़बूत स्थिति में दिखाई देते हैं। ब्रेमर के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी का लंबा कार्यकाल उन्हें दीर्घकालिक नीतियों पर काम करने और उनके दूरगामी परिणाम देखने का अवसर देता है, जो कई पश्चिमी और यूरोपीय नेताओं के पास नहीं है।
ब्रेमर ने कहा, “एक नेता के रूप में, मोदी का सत्ता में लंबे समय तक बने रहना और उनकी नीतियों में निरंतरता, उन्हें कई यूरोपीय नेताओं की तुलना में अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने और अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करने की अधिक क्षमता देता है। बीते वर्षों में हमने इसे व्यवहार में देखा भी है।”
ट्रंप के ‘शांति बोर्ड’ से सहयोगी दूर
इसी बीच, ट्रंप की विदेश नीति को एक और झटका तब लगा, जब उनके द्वारा प्रस्तावित ‘शांति बोर्ड’ को प्रमुख सहयोगियों का समर्थन नहीं मिला। गुरुवार को ट्रंप ने हमास और इजराइल के बीच हुए युद्धविराम को बनाए रखने के प्रयासों के लिए इस बोर्ड का औपचारिक अनावरण किया, लेकिन अमेरिका के कई करीबी साझेदार देशों ने इसमें शामिल होने से परहेज़ किया।
रूस ने इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है, जबकि ब्रिटेन ने साफ तौर पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। फ्रांस के इंकार के बाद नॉर्वे और स्वीडन ने भी संकेत दिए हैं कि वे इस पहल का हिस्सा नहीं बनेंगे।
फ्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि उनका देश गाज़ा शांति योजना का समर्थन करता है, लेकिन उसे आशंका है कि यह नया बोर्ड संघर्ष समाधान के मुख्य मंच के रूप में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमज़ोर करने की कोशिश कर सकता है। यही चिंता अन्य यूरोपीय देशों में भी देखी जा रही है, जिसके चलते ट्रंप की इस पहल को व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिल पा रहा है।













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