डेस्क : उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत एक बार फिर अपने तीखे बयानों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता जताई है। राउत का कहना है कि संसद में राहुल गांधी द्वारा जनरल नरवणे का हवाला दिए जाने और सरकार द्वारा उसे रोके जाने के बाद पैदा हुए हालात चिंताजनक हैं।
मंगलवार को मीडिया से बातचीत में संजय राउत ने कहा कि राहुल गांधी ने संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा उठाने की कोशिश की, लेकिन सरकार ने उन्हें बोलने से रोक दिया, जो उचित नहीं है। राउत के अनुसार, इसी पूरे घटनाक्रम के बाद उन्हें पूर्व सेना प्रमुख की सुरक्षा को लेकर आशंका हो रही है। उन्होंने कहा, “अब मुझे मनोज मुकुंद नरवणे की सुरक्षा की चिंता सता रही है। उनके साथ आगे क्या हो सकता है, यह मैं नहीं कह सकता। ऐसे में उनकी सुरक्षा बढ़ाई जानी चाहिए।”
संजय राउत ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जब देश पर संकट आता है या कोई पड़ोसी देश सीमा पर आक्रामक गतिविधियां करता है, तब निर्णय लेने की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की होती है। उन्होंने दावा किया कि जनरल नरवणे चीन के अतिक्रमण के मुद्दे पर लगातार राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट निर्देश मांग रहे थे, लेकिन उस समय साहसिक फैसला नहीं लिया गया। राउत ने तंज कसते हुए कहा, “56 इंच का सीना रखने वाले उस वक्त पीछे हट गए।”
राउत ने यह भी कहा कि इतिहास गवाह है कि इस तरह के मामलों में पहले भी संदिग्ध घटनाएं हो चुकी हैं, इसलिए पूर्व सेना प्रमुख की सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
साथ ही, संजय राउत ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का मुद्दा उठाते हुए सवाल किया कि सीमा सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाने पर उनके साथ क्या हुआ था। उन्होंने कहा कि वांगचुक ने भी तो देश की सीमाओं की सुरक्षा का मुद्दा सामने रखा था।
गौरतलब है कि सोमवार को लोकसभा में उस समय जोरदार हंगामा हुआ था, जब राहुल गांधी ने संसद में बोलते हुए पूर्व थलसेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे की एक गैर-प्रकाशित पुस्तक का उल्लेख किया। राहुल गांधी ने डोकलाम में भारतीय सीमा के नजदीक चीनी टैंकों की मौजूदगी का कथित मामला उठाया था। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि संसद में ऐसी किसी पुस्तक का हवाला नहीं दिया जा सकता, जो अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है। रक्षा मंत्री का तर्क था कि यदि पुस्तक में उल्लिखित तथ्य सही होते, तो उसके प्रकाशन पर कोई रोक नहीं लगाई जाती।













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