डेस्क: एनसीआरटी विवाद ने राजनीतिक और शैक्षिक मंच पर हलचल मचा दी है। सूत्रों के अनुसार, मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिडिल स्कूल के छात्रों के लिए तैयार पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले को शामिल करने पर स्पष्ट असंतोष जताया। प्रधानमंत्री ने इस सामग्री की उपयुक्तता और इसे मंजूरी देने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और पूछा कि “हम कक्षा 8 के बच्चों को न्यायिक भ्रष्टाचार के बारे में क्या सिखा रहे हैं?”
मॉनीटरिंग और अप्रूवल पर चिंता
सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने यह भी पूछा कि क्लासरूम में ऐसी सामग्री को अप्रूव कौन कर रहा था और मॉनीटरिंग किसने की। उनके सवाल इस बात को उजागर करते हैं कि संवेदनशील संस्थागत मुद्दों को प्रारंभिक शिक्षा स्तर पर कैसे पेश किया जा रहा है, इस पर सरकार के भीतर असंतोष है। विवादास्पद पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के एक उदाहरण को शामिल किया गया है, जिससे आयु उपयुक्तता और पाठ्यपुस्तक अनुमोदन प्रक्रिया पर सवाल उठ गए हैं।
विवाद की पूरी जानकारी
नई पाठ्यपुस्तक के ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ खंड में बताया गया है कि भ्रष्टाचार, लंबित मुकदमों का भारी बोझ और न्यायाधीशों की कमी न्यायिक प्रणाली के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। इसके अलावा पाठ्यपुस्तक में यह भी उल्लेख है कि न्यायाधीश आचार संहिता के तहत काम करते हैं, जो अदालत के भीतर और बाहर उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्वत: संज्ञान लिया। गुरुवार को न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी भी वैध आलोचना को दबाना या न्यायपालिका की समीक्षा के अधिकार को रोकना नहीं है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शिक्षा मंत्रालय की ओर से बिना शर्त माफी मांगी। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि एनसीईआरटी के पत्र में माफी का कोई शब्द नहीं है और अध्याय को सही ठहराने का प्रयास किया गया है।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यह गलती अनजाने में नहीं हुई और इस उम्र के छात्रों को पक्षपातपूर्ण सामग्री से अवगत कराना अनुचित है। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी।













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