डेस्क : बिहार की राजनीति में गुरुवार को बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला। लंबे समय तक राज्य के राजनीतिक केंद्र रहे नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने का ऐलान किया और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया। उनके इस फैसले के बाद राज्य में नए राजनीतिक समीकरण बनने की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है।
नीतीश कुमार के इस कदम पर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस नेता और राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा कि नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव में जनता से जनादेश लिया था। ऐसे में मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना कई सवाल खड़े करता है। पायलट ने कहा, “नीतीश कुमार किसके दबाव में यह फैसला ले रहे हैं, यह साफ नहीं है।” उन्होंने नीतीश कुमार के बार-बार गठबंधन बदलने वाले राजनीतिक इतिहास पर भी तंज कसा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद पहली बार बिहार में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो हिंदी पट्टी के इस महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा सीधे तौर पर सरकार चला सकती है।
नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने फैसले की वजह बताते हुए लिखा कि 2005 से बिहार की जनता ने उन पर भरोसा जताया और उसी विश्वास के बल पर उन्होंने राज्य की सेवा की। उन्होंने कहा कि उनका हमेशा से उद्देश्य रहा कि वह लोकतंत्र के सभी प्रमुख सदनों—विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा—के सदस्य बनें। यही अधूरी इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने राज्यसभा जाने का निर्णय लिया।
जेडीयू के भीतर भी उनके इस फैसले को लेकर नाराजगी की खबरें हैं। मुख्यमंत्री आवास के बाहर कुछ कार्यकर्ताओं ने विरोध जताया और कई नेताओं ने माना कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद पर बने रहना चाहिए था।
इस बीच नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की सक्रिय राजनीति में संभावित एंट्री को लेकर चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें नई सरकार में अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है।
बिहार की राजनीति में इस ऐतिहासिक बदलाव ने राज्य की सत्ता के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।













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