डेस्क : भारतीय संगीत इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो केवल सुर नहीं होते, बल्कि राष्ट्र की भावना बन जाते हैं। ऐसा ही एक अमर देशभक्ति गीत है “ऐ मेरे वतन के लोगों”, जिसे सुनकर आज भी लाखों लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। लेकिन इस गीत के पीछे एक दिलचस्प और भावुक कहानी भी छिपी है, जिसमें लता मंगेशकर और आशा भोसले दोनों का नाम जुड़ा है।
यह गीत 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की स्मृति में लिखा गया था। इसके गीतकार कवि प्रदीप और संगीतकार सी. रामचंद्र थे।
आशा भोसले से शुरू हुई थी तैयारी
शुरुआत में इस गीत के लिए आवाज आशा भोसले को चुना गया था। बताया जाता है कि संगीतकार सी. रामचंद्र और आशा भोसले के बीच सहमति भी बन गई थी और उन्होंने रिहर्सल भी शुरू कर दी थी।
फिर आया बड़ा बदलाव
लेकिन इसी दौरान परिस्थितियाँ बदल गईं। गीतकार कवि प्रदीप का मानना था कि इस गीत की भावनात्मक गहराई को सिर्फ लता मंगेशकर ही सही तरह से व्यक्त कर सकती हैं। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से लता मंगेशकर से संपर्क किया और उन्हें मनाने की कोशिश की।
लता मंगेशकर पहले व्यस्तताओं के कारण हिचकिचाईं, लेकिन बाद में उन्होंने इस ऐतिहासिक गीत को गाने के लिए सहमति दे दी।
आशा भोसले का हटना और लता की एंट्री
रिहर्सल के बाद आशा भोसले ने अंततः इस कार्यक्रम से हटने का निर्णय लिया। इसके बाद पूरा दायित्व लता मंगेशकर के कंधों पर आ गया।
वह ऐतिहासिक दिन – 26 जनवरी 1963
यह गीत पहली बार 26 जनवरी 1963 को नई दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में प्रस्तुत किया गया। उस समय मंच पर राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सहित कई बड़े नेता मौजूद थे।
लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत सुनकर पूरा वातावरण भावुक हो उठा। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक की आंखें नम हो गई थीं।
क्यों बन गया यह गीत अमर
यह गीत सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं रहा, बल्कि शहीद सैनिकों के प्रति देश की श्रद्धांजलि बन गया। बाद में इसके सभी कलाकारों ने इसकी रॉयल्टी को युद्ध विधवाओं के कल्याण के लिए दान कर दिया।












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