जयपुर : निर्माण नगर स्थित एक स्थानीय विद्यालय के संबोधि सभागार में शुक्रवार को आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने विनय, अहंकार-त्याग और आत्मिक उन्नति पर गहन आध्यात्मिक संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति विद्या अर्जित कर विद्वान तो बन सकता है, परंतु महानता केवल विनय से प्राप्त होती है। “दुनिया में इंसान विनय से ही महान बनता है। महान वही है जो विनयवान है,” उन्होंने स्पष्ट किया।
मुनि श्री ने आगे कहा कि जीवन में अहंकारी की पराजय और विनयशील व्यक्ति की विजय निश्चित होती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि श्रीराम विनय और मर्यादा के प्रतीक थे। वे सदैव बड़ों का सम्मान और छोटों का आदर करते थे तथा सफलता मिलने पर भी कभी अभिमान नहीं करते थे। उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि माता कौशल्या के प्रश्न पर श्रीराम ने विनम्र भाव से कहा था—“लंकापति रावण को मैंने नहीं, उसके ‘मैं’ ने मारा।”
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य की वास्तविक ऊँचाई और गहराई पद, प्रतिष्ठा, विद्या या उपाधियों से नहीं आँकी जाती, बल्कि उसके भीतर की विनयशीलता, सहनशीलता, क्षमाशीलता, उदारता और संवेदनशीलता से उसका मूल्यांकन होता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को प्रकृति से भद्र बनकर प्रत्येक आगंतुक का आदर करना चाहिए तथा किसी को तुच्छ समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए। साथ ही उन्होंने आवेश, क्लेश और अहंकार से दूर रहने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की शुरुआत तीर्थंकर श्रेयांस प्रभु की स्तुति से हुई। मुनि श्री ने जप, तप, ध्यान और स्वाध्याय के माध्यम से उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को आध्यात्मिक साधना के लिए प्रेरित किया। अंत में प्रवचन का समापन मंगल पाठ के साथ विधिवत सम्पन्न हुआ।













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