डेस्क : हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता देव आनंद अपनी बेबाकी और स्वतंत्र सोच के लिए जाने जाते थे। वर्ष 1975 में लगे भारतीय आपातकाल (1975–77) के दौरान उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतियों का खुलकर विरोध किया, जिसका सीधा असर उनके फिल्मी करियर पर पड़ा।
बताया जाता है कि आपातकाल के समय सरकार की ओर से कई कलाकारों से सार्वजनिक समर्थन देने को कहा गया था। इसी क्रम में देव आनंद से भी दूरदर्शन पर आकर सरकार के पक्ष में बयान देने का आग्रह किया गया, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। उनके इस रुख को सत्ता के खिलाफ माना गया।
सूत्रों के अनुसार, इसके बाद उनकी फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उनकी नई फिल्मों की रिलीज प्रभावित हुई, वहीं दूरदर्शन पर उनके कार्यों का प्रसारण भी रोक दिया गया। यह निर्णय उस दौर में सिनेमा पर लागू कड़ी सेंसरशिप का हिस्सा माना गया।
देव आनंद ने बाद में आपातकाल को “अंधेरी रात” और “एक बुरा सपना” बताया था। उनका मानना था कि उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर अंकुश लगा दिया गया था, जिससे कलाकारों और रचनात्मक लोगों को भारी दबाव झेलना पड़ा।
आपातकाल समाप्त होने के बाद देव आनंद ने राजनीतिक स्तर पर भी सक्रियता दिखाई। उन्होंने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर ‘नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया’ नामक राजनीतिक दल का गठन किया। हालांकि यह दल लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह सका।
फिल्मकार शेखर कपूर ने भी एक अवसर पर कहा था कि देव आनंद केवल एक अभिनेता ही नहीं, बल्कि अपने विचारों के लिए खड़े रहने वाले साहसी व्यक्ति थे, जो किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं होते थे।
गौरतलब है कि 1975 से 1977 के बीच लागू आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का एक संवेदनशील दौर रहा, जिसमें मीडिया, सिनेमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए थे। इस दौरान कई कलाकारों और कृतियों को सेंसरशिप और बैन का सामना करना पड़ा।













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