लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘श्रुताभ्यास क्यों करें?’ को वर्णित करते हुए कहा कि दो प्रश्न किए गए कि श्रुत का अश्रय कौन ले और किसलिए ले? शास्त्रकार ने इसका उत्तर प्रदान करते हुए कहा है कि उत्तम अर्थ की खोज करने वाले को श्रुताश्रयण करना चाहिए। प्रश्न हो सकता है कि उत्तम अर्थ क्या है, इसलिए संदर्भ में बताया गया है कि उत्तम अर्थ मोक्ष को बताया गया है। चार प्रकार के धर्मों में काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष। इनके दो युगल हो जाते हैं- काम और अर्थ का एक युगल है जो सांसारिक रूप में है। दूसरा युगल है धर्म और मोक्ष। यह चार पुरुषार्थ हैं। इनमें उत्तम पुरुषार्थ मोक्ष होता है। जो साधु मोक्ष मार्ग को अपना चुका है, जो मोक्ष की खोज है, उसे श्रुत का अभ्यास करना चाहिए।
श्रुत का आश्रयण लेने से स्वयं को मोक्ष ले जाया जा सकता है और दूसरों की मोक्ष प्राप्ति में भी सहायक बन सकते हो। अध्यात्म विद्या का ज्ञान मिलने से आदमी अपनी साधना भी अच्छे ढंग से कर सकता है। साधु का क्या आचार है?, क्या कल्पता है, क्या नहीं कल्पता है, करणीय-अकरणीय जैसी अनेक चीजें शास्त्रों से प्राप्त होती हैं। इसलिए श्रुत की आराधना करने वाला स्वयं सत्पथ पर चलेगा और उसके पास ज्ञान है तो वह दूसरों को उस सत्पथ के विषय में बता सकता है और दूसरों को भी उस पथ पर चलने हेतु उत्प्रेरित कर सकता है। कितनों के प्रतिबोध प्रदान किया जा सकता है। कितनों को गलत मार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लाया जा सकता है। अगर श्रुत है तो आदमी दूसरों को भी अध्यात्म की आराधना-साधना में सहयोग कर सकता है। इसलिए श्रुत का अभ्यास करना चाहिए। हालांकि सभी में उतनी प्रतिभा न भी हो।
श्रुतार्जन का अच्छा प्रयास करना चाहिए। श्रुत होने पर भी आदमी को अहंकार में नहीं जाना चाहिए। ज्ञान प्राप्त हो जाए तो उसके भी अहंकार से बचने का प्रयास करना चाहिए। विद्या के साथ विनय हो तो विद्या शोभित होती है। ज्ञान होने पर भी मौन रखना बहुत अच्छी बात है। श्रुत की प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए। उसमें समय का नियोजन हो। जो योग्य हैं, उन्हें दूसरों को शिक्षा देने, ज्ञान देने का प्रयास करना चाहिए, वह भी अच्छी सेवा हो सकती है। आगम का कुछ कंठस्थ ज्ञान हो, स्वाध्याय करते रहें, उसका यथासंभव व्याख्यान आदि में उपयोग करते रहें। इस प्रकार आदमी दूसरों को भी मोक्ष के मार्ग पर ले जाने में सहायक बन सकता है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को जिज्ञासा-समाधान का भी अवसर प्रदान किया। यह अवसर प्राप्त कर चारित्रात्माओं ने अपनी-अपनी जिज्ञासाएं आचार्यश्री के समक्ष प्रस्तुत कीं तो आचार्यश्री ने उन्हें उत्तरित किया। आचार्यश्री की अभिवंदना का कार्यक्रम भी प्रस्तुतियों की दृष्टि से अभी भी गतिमान है। इस क्रम में साध्वी स्तुतिप्रभाजी ने गीत का संगान किया। साध्वी वीरप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बालक परम व पार्थ बच्छावत ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी।













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