जयपुर :आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व का सच्चा दर्पण होती है। जिस प्रकार मनुष्य के आचरण से उसका स्वरूप प्रकट होता है, उसी प्रकार उसकी वाणी से उसकी पहचान निर्मित होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को बोलने से पहले विचार करना चाहिए और फिर शब्दों का चयन करना चाहिए। उन्होंने प्रेरक सूत्र देते हुए कहा— “पहले तोलो, फिर बोलो”, क्योंकि शब्द अनमोल होते हैं और एक बार मुख से निकल जाने के बाद उनका प्रभाव स्थायी हो जाता है।
निर्माण नगर, जयपुर में आयोजित वाणी विवेक विषयक प्रवचन में उन्होंने कहा कि वाणी का प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिए। वाणी में सृजन और विनाश दोनों की शक्ति निहित होती है। विवेकपूर्ण वाणी से जीवन में शांति, सौहार्द और प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है, जबकि अविवेकपूर्ण वाणी संबंधों में दरार और वातावरण में विष घोल देती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की वाणी में ही उसका चरित्र झलकता है। इसलिए ऐसी भाषा का प्रयोग होना चाहिए जिससे किसी का कल्याण हो, न कि किसी को आघात पहुंचे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वाणी में अमृत भी है और विष भी, और यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह किसका प्रयोग करता है। विवेकी व्यक्ति की वाणी सदैव अमृतमयी होती है, जबकि अविवेकी व्यक्ति की भाषा वातावरण को दूषित कर देती है।
इसी विषय पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने कहा कि “गोली का घाव भर सकता है, किन्तु बोली का घाव प्रायः नहीं भरता।” इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को बोलते समय संयम और संतुलन रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि समझदार व्यक्ति सोचकर बोलता है, जबकि अविवेकी व्यक्ति बोलकर सोचता है।
उन्होंने यह भी कहा कि मानव जीवन में सर्वाधिक उपयोग वाणी का ही होता है, और बोलना एक कला है। कब, कहाँ, कितना और कैसे बोलना है— यह विवेक ही व्यक्तित्व का सर्वोच्च गुण है, जो जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।
कार्यक्रम का प्रारम्भ तीर्थंकर भक्ति गीत से हुआ। इसके पश्चात प्रेक्षाध्यान के प्रयोग करवाए गए तथा आगम वाणी का उच्चारण किया गया। मंगल पाठ एवं आभार ज्ञापन के साथ सभा का समापन हुआ। कार्यक्रम में श्रावक-श्राविकाओं की विशेष उपस्थिति रही, जिससे वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो गया।
समापन संदेश: वाणी यदि संयमित हो तो जीवन में शांति का आधार बनती है, और यदि असंयमित हो तो वही संबंधों के विनाश का कारण भी बन सकती है।













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