जयपुर : जयपुर स्थित निर्माण नगर के एक विद्यालय में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन सभा में आचार्य महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने जीवन में विवेक की सर्वोच्च महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विद्या से भी अधिक मूल्यवान तत्व विवेक है।
उन्होंने कहा कि विवेक का संबंध केवल बाहरी ज्ञान से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की गहराइयों और अंतरबोध से होता है। मनुष्य कब, कहाँ, कैसे, क्या और कितना बोले या करे—इसका सही निर्णय बाहरी पुस्तकीय ज्ञान से नहीं, बल्कि भीतरी विवेक से ही संभव होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा तभी सार्थक बनती है जब वह विवेक से आलोकित हो।
मुनि श्री ने कहा कि “मानव की मानवता का वास्तविक आधार विवेक है।” उन्होंने समझाया कि सही और गलत, कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच भेद करने की क्षमता केवल विवेक से ही प्राप्त होती है। विवेक को उन्होंने “मनुष्य का तीसरा नेत्र” बताते हुए कहा कि यही मनुष्य का सच्चा मार्गदर्शक है, जो जीवन के प्रत्येक मोड़ पर सही दिशा प्रदान करता है।
इसी अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि विवेक वह शक्ति है जो प्रत्येक समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है। उनके अनुसार धर्म और सद्कर्म का मूल आधार भी विवेक ही है। उन्होंने विवेक को मनुष्य का सर्वोत्तम मित्र बताते हुए कहा कि यह आत्मानुशासन को जागृत कर जीवन को सही मार्ग पर अग्रसर करता है।
कार्यक्रम के दौरान तीर्थंकर अनंत प्रभु के जन्म कल्याणक के उपलक्ष्य में चौबीसी का संगान किया गया। साथ ही तनाव मुक्ति हेतु कायोत्सर्ग का प्रयोग भी कराया गया। अंत में पवित्र उदघोषों के साथ आध्यात्मिक कार्यक्रम का शांतिपूर्ण समापन हुआ।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
