डेस्क : दुनिया की अर्थव्यवस्था अगले एक वर्ष में धीमी पड़ सकती है। वैश्विक स्तर पर किए गए विभिन्न आर्थिक सर्वेक्षणों और संस्थानों की रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई है कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ऊंची ऊर्जा कीमतें, व्यापारिक अनिश्चितता और कमजोर मांग के कारण वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर दबाव बढ़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक आर्थिक संस्थानों ने हालिया आकलनों में कहा है कि 2026 के दौरान वैश्विक विकास दर में नरमी देखी जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव, ऊर्जा आपूर्ति पर असर और वैश्विक व्यापार में बढ़ती बाधाएं आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, कई देशों में उपभोक्ता खर्च घट रहा है और उद्योगों में निवेश की गति भी धीमी पड़ी है। अमेरिका, यूरोप और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में मांग कमजोर होने के संकेत मिल रहे हैं। जर्मनी सहित यूरोप के कई देशों ने अपने विकास अनुमान घटा दिए हैं। वहीं, ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई का दबाव फिर बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों में शामिल बड़ी कंपनियों और कारोबारी संगठनों ने भी अगले एक वर्ष को चुनौतीपूर्ण बताया है। कंपनियों का कहना है कि बढ़ती लागत, सप्लाई चेन में रुकावट और वैश्विक अनिश्चितता कारोबार पर असर डाल रही है। कई अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि भू-राजनीतिक संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक विकास दर और नीचे जा सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), तकनीकी निवेश और कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मजबूत घरेलू मांग वैश्विक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह मंदी में जाने से बचा सकती है। भारत और दक्षिण एशिया को अब भी दुनिया के सबसे तेज बढ़ने वाले क्षेत्रों में माना जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि लगभग 2.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो महामारी से पहले के औसत स्तर से कम है। वहीं, आईएमएफ ने भी अगले वर्ष वैश्विक विकास दर में नरमी की संभावना जताई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में केंद्रीय बैंकों की नीतियां, ऊर्जा बाजार की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक हालात यह तय करेंगे कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी।













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