जयपुर : निर्माण नगर स्थित महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल के संबोधि सभागार में शुक्रवार को मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ के सान्निध्य में एक आध्यात्मिक प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। “शांति के साधक-बाधक तत्त्व” विषय पर प्रेरक उद्बोधन देते हुए उन्होंने कहा कि तनाव और अशांति का मूल कारण मनुष्य का नकारात्मक चिंतन है।
मुनि श्री ने कहा कि जैसे वर्ष का विभाजन कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में होता है, वैसे ही मानव चिंतन के भी दो स्वरूप होते हैं—नकारात्मक और सकारात्मक। उन्होंने समझाया कि नकारात्मक चिंतन कृष्ण पक्ष के समान अंधकार का प्रतीक है, जबकि सकारात्मक चिंतन शुक्ल पक्ष के समान प्रकाश और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। यदि जीवन में शांति और सुख का उजाला चाहिए तो मनुष्य को सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा, क्योंकि नकारात्मक भाव ही तनाव और अशांति को जन्म देते हैं।
उन्होंने आगे नकारात्मक भावों की व्याख्या करते हुए कहा कि काम, क्रोध, भय, लोभ-लालच, अहंकार और वहम जैसे भाव व्यक्ति के भीतर अशांति का बीज बोते हैं। ये प्रवृत्तियाँ न केवल मानसिक संतुलन को प्रभावित करती हैं, बल्कि सामाजिक समरसता और शांत सह-अस्तित्व में भी बाधक बनती हैं।
मुनि श्री ने कहा कि इन नकारात्मक भावों से मुक्ति का मार्ग ध्यान, योग, प्राणायाम, अनुप्रेक्षा तथा शुभ भावनाओं के अभ्यास में निहित है। नियमित साधना से मनुष्य अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकता है और जीवन को संतुलित व शांत बना सकता है।
कार्यक्रम में मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति शांति चाहता है, किंतु अशांति के कारणों से बचना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि अशांति का मूल कारण मन, वचन और काया की दुष्प्रवृत्तियाँ हैं। इनके स्थान पर शुभ प्रवृत्तियों को अपनाकर ही जीवन की समस्याओं का समाधान संभव है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में भक्तिगीत का सुमधुर गायन किया गया। इस अवसर पर तेरापंथ धर्म संघ के वयोवृद्ध संत श्री आत्मानंद जी के देवलोकगमन के उपलक्ष्य में दो मिनट का मौन रखते हुए चार लोगस्स का ध्यान किया गया। कार्यक्रम का समापन मंगल पाठ के साथ हुआ।













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