डेस्क : पूर्वी भूमध्यसागर में बदलते सामरिक समीकरणों के बीच साइप्रस ने भारत की सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ खरीदने में गहरी रुचि दिखाई है। इस संभावित रक्षा सौदे ने तुर्किये की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि साइप्रस और तुर्किये के बीच लंबे समय से समुद्री सीमा, ऊर्जा संसाधनों और उत्तरी साइप्रस को लेकर तनाव बना हुआ है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारत और साइप्रस के बीच 2026-31 के लिए व्यापक रक्षा सहयोग रोडमैप तैयार किया जा रहा है। इसमें सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, रक्षा तकनीक सहयोग और संयुक्त अभ्यास जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसी सहयोग के तहत साइप्रस भारत से ब्रह्मोस मिसाइल, कामिकाज़े ड्रोन और अन्य रक्षा प्रणालियां खरीदने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है।
हाल ही में साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलिडिस की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” के स्तर तक बढ़ाने की घोषणा की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और साइप्रस नेतृत्व के बीच हुई वार्ता में आतंकवाद-रोधी सहयोग, समुद्री सुरक्षा और रक्षा उद्योग में साझेदारी पर विशेष जोर दिया गया।
क्यों खास है ब्रह्मोस?
ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज संचालनात्मक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में गिनी जाती है। भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित इस मिसाइल की गति लगभग मैक 2.8 से 3 तक मानी जाती है। इसे जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से लॉन्च किया जा सकता है। इसकी उच्च गति और कम प्रतिक्रिया समय इसे दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।
भारत अब तक ब्रह्मोस का निर्यात फिलीपींस को कर चुका है, जबकि इंडोनेशिया, वियतनाम, मिस्र और कई अन्य देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है। ऐसे में यदि साइप्रस के साथ यह सौदा आगे बढ़ता है तो यह भारत की रक्षा निर्यात नीति के लिए बड़ी सफलता मानी जाएगी।
तुर्किये क्यों है चिंतित?
पूर्वी भूमध्यसागर में तुर्किये और साइप्रस के बीच दशकों से विवाद चला आ रहा है। 1974 में तुर्किये के सैन्य हस्तक्षेप के बाद साइप्रस दो हिस्सों में बंट गया था। उत्तरी साइप्रस पर तुर्किये समर्थित प्रशासन का नियंत्रण है, जबकि दक्षिणी भाग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त रिपब्लिक ऑफ साइप्रस है।
तुर्किये लंबे समय से पूर्वी भूमध्यसागर में गैस भंडार और समुद्री आर्थिक क्षेत्रों को लेकर आक्रामक रुख अपनाता रहा है। ऐसे में यदि साइप्रस के पास ब्रह्मोस जैसी लंबी दूरी और तेज हमलावर क्षमता वाली मिसाइल प्रणाली आती है, तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदल सकता है। तुर्किये के रक्षा विशेषज्ञों और मीडिया में इस संभावित सौदे को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, साइप्रस केवल ब्रह्मोस ही नहीं बल्कि भारतीय कामिकाज़े ड्रोन और अन्य आधुनिक हथियार प्रणालियों में भी दिलचस्पी दिखा रहा है। माना जा रहा है कि यह कदम तुर्किये की बढ़ती सैन्य सक्रियता और क्षेत्रीय दबाव के जवाब में उठाया जा रहा है।
भारत के लिए क्या मायने?
विशेषज्ञों का मानना है कि साइप्रस के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारी भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे भारत को पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने का अवसर मिलेगा। यह वही क्षेत्र है जहां यूरोप, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका की भू-राजनीतिक गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं।
भारत लंबे समय से हिंद-प्रशांत क्षेत्र से आगे अपनी वैश्विक रणनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। साइप्रस के साथ रक्षा सहयोग को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हालांकि अभी तक ब्रह्मोस खरीद को लेकर कोई आधिकारिक समझौता घोषित नहीं किया गया है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है तो इससे न केवल भारत के रक्षा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पूर्वी भूमध्यसागर की सामरिक राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।













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