भारत सरकार की अग्निपथ योजना को अपने ही देश में अग्निपरीक्षा देनी पड़ रही है। विचारणीय बात यह है की इस योजना का ऐलान करने के अगले ही दिन से उत्तर भारत के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इतनी जल्दी युवा समझ गए क्या गलत हो रहा है और संगठित होकर प्रदर्शन के नाम पर अराजकता फैलाने लगे। प्रदर्शन करने वाले वही युवा हैं, जो सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। इन प्रदर्शनकारियों ने कई ट्रेनों को आग लगा दी, तोड़फोड़ की और पुलिस पर पत्थर भी बरसाए। जो युवा देश की रक्षा करने के लिए सेना में जाना चाहते हैं, वही युवा अपने देश में आग लगा रहे हैं। क्या यह संभव है? वैसे सेना रोजगार गारंटी स्कीम नहीं है। हमें सशक्त सेना चाहिए। इसमें सैनिकों का चयन उनकी काबिलियत पर होना चाहिए। एक और बात.. हमारे देश के इन युवाओं को ये बात समझनी होगी कि सेना में नौकरी करना उनका अधिकार नहीं है बल्कि ये एक सेवा की तरह है। लेकिन इसे अधिकार नहीं माना जा सकता। हमारे देश के युवाओं को ये गुस्सा पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के लिए संभाल कर रखना चाहिए, अपने ही देश के खिलाफ इस गुस्से का क्या मतलब है? यह गुस्सा है या षड्यंत्र?
विरोध के नाम पर जो विरोध हो रहा है उन से अपना और गूगलजी का ज्ञान शेयर कर रहा हूँ। जो यह कह रहे हैं कि सेना में चार साल नौकरी करने के बाद अग्निवीरों का भविष्य अंधकार में चला जाएगा, उन लोगों को अमेरिका का उदाहरण देना चाहता हूँ।
अमेरिका में भी इसी तरह एक निर्धारित समय अवधि के लिए युवाओं को सेना में भर्ती किया जाता है। वहां लगभग 80 प्रतिशत सैनिक अपनी सेवा के आठवें साल में ही रिटायर हो जाते हैं। यानी 20 साल में कोई युवा अमेरिका की सेना में शामिल हुआ है तो वो 28 साल की उम्र तक रिटायर हो जाता है और ऐसे सैनिकों को इसके बाद वहां पेंशन भी नहीं मिलती। तो फिर क्या अमेरिका के ये पूर्व सैनिक भी अपने जीवन में कुछ कर नहीं पाते और बेरोजगार रहते हैं? इसका जवाब है नहीं। वर्ष 2021 में अमेरिका के पूर्व सैनिकों की बेरोजगारी दर सिर्फ 4.4 प्रतिशत थी और ये आंकड़ा वहां की राष्ट्रीय बेरोजगारी दर से भी कम था।
इसे आप ऐसे समझिए कि अगर अमेरिका की सेना में आठ साल की नौकरी करने के बाद 100 सैनिक रिटायर हुए तो उनमें से 95 से ज्यादा सैनिकों को नौकरी मिल गई। यानी सामान्य लोगों की तुलना में पूर्व सैनिकों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। क्योंकि वो स्किल्ड होते हैं, अनुशासित होते हैं, उनमें नेतृत्व की विशेषता होती हैं, वो शारिरिक रूप से फिट होते हैं और वो चुनौतियों से भागते नहीं हैं। इसलिए ये बात गलत है कि भारतीय सेना में चार साल नौकरी करने के बाद अग्निवीर बेरोजगार रहेंगे।
इसके अलावा इजरायल में भी हर नागरिक के लिए तीन साल सेना में अपनी सेवाएं देना अनिवार्य हैं और वहां भी इन पूर्व सैनिकों को आसानी से नौकरियां मिल जाती हैं। आज इजरायल की प्रौद्योगिकी उद्योग दुनिया के बड़े-बड़े देशों को टक्कर दे रही है। इस उद्योग के विकास में वहां के पूर्व सैनिकों का खास योगदान रहा है।
कुछ समय पहले श्रीलंका की जर्जर आर्थिक स्थिति पर एक कार्यक्रम देख रहा था तब अंग्रेजी की एक कहावत सुनी Good Economics Make Bad Politics यानी जो फैसले देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे होते हैं, वो अक्सर लोगों के बीच ज्यादा लोकप्रिय नहीं होते। जबकि जो फैसले लोकप्रिय होते हैं, वो अक्सर अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा पाते हैं।
जैसे अभी ये घोषणा कर दी जाए कि देश के हर युवा को पांच हजार रुपये हर महीने मिलेंगे तो ये फैसला लोकप्रिय तो होगा लेकिन देशहित में नहीं होगा। इससे देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी और यही बात आज आपको समझनी है।
वर्ष 1932 में जब अमेरिका इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी का सामना कर रहा था, जिसे The Great Depression भी कहते हैं, तब भी पुरानी व्यवस्था में किए गए सुधारों का जबरदस्त विरोध हुआ था। उस समय Franklin D. Roosevelt अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे और उन्होंने आर्थिक मंदी से निपटने के लिए कई बड़े आर्थिक सुधार किए थे।
उन्होंने सामाजिक सुरक्षा के साथ पेंशन की सुविधा शुरू की थी। कर्मचारियों को यूनियन बनाने का अधिकार दिया था और कई Infrastructure Projects भी शुरू किए थे ताकि लोगों को इनकी मदद से रोजगार मिल सके। लेकिन इन सुधारों का उस समय कई बड़े संगठनों ने विरोध किया और ये मामला बाद में वहां की सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इन पर रोक लगा दी थी। इससे खफा होकर तब Franklin D. Roosevelt ने अपने एक भाषण में कहा था कि अमेरिका की सरकार को तीन घोड़ों की एक टीम चलाती है। इनमें एक घोड़ा है, अमेरिका की संसद, दूसरा घोड़ा है अमेरिका की सरकार और तीसरा घोड़ा है वहां की अदालतें यानी न्यायपालिका।
उनका कहना था कि इनमें से दो घोड़े यानी संसद और सरकार तो एक ही दिशा में चल रहे हैं लेकिन जो तीसरा घोड़ा है यानी जो न्यायपालिका है वो अलग दिशा में भाग रही है। और वो आर्थिक सुधारों को सफल नहीं होने दे रही। बड़ी बात ये है कि उस समय Franklin D. Roosevelt ने जितने भी आर्थिक सुधार किए, उनका विरोध तो हुआ लेकिन बाद में अमेरिका के नीति निर्माताओं ने माना कि ये तमाम फैसले बिल्कुल सही थे।
इसी तरह 19वीं शताब्दी की शुरुआत में जब औद्योगिक क्रांति के तहत पश्चिमी यूरोप के देशों में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हो रहे थे और इन उद्योगों में मशीनों का इस्तेमाल हो रहा था तो मशीनों को इंसानों के दुश्मन के तौर पर देखा गया। उस समय ये कहा गया कि मशीनें इंसानों से उनका काम छीन लेंगी और इंसान बेरोजगार हो जाएंगे। उस समय मजदूर ऐसी फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ करते थे, जहां मशीनों का इस्तेमाल होता था। उस समय की तस्वीरें आप देख सकते हैं।
ब्रिटेन के मशहूर आविष्कारक John Kay ने जब कपड़ा बनाने के लिए Flying Shuttle नाम से एक मशीन बनाई तो कुछ लोगों ने इंग्लैंड में उनका घर जला दिया था। ये बात वर्ष 1753 की है। उस समय तो इस मशीन का विरोध हुआ।l लेकिन दो दशकों के बाद ये मशीन कपड़ा उद्योग में एक नई क्रान्ति ले आई थी।
इसी तरह जब अंग्रेज भारत में रेल लेकर आए तो इसका भी विरोध हुआ था। उस समय बड़ी संख्या में लोग इसके खिलाफ़ सड़कों पर उतर आए थे और इन लोगों का कहना था कि रेल में एक साथ सफर करने से भारत की जाति व्यवस्था और धार्मिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी और इससे ऊंची जाति के लोगों को पिछड़ी जाति के लोगों के साथ एक ही रेल में सफर करना पड़ेगा। इस पर विरोध करने वाले इन लोगों में तब महात्मा गांधी भी थे और महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज में इसके पीछे तीन वजह बताई थीं। उनका मानना था कि भारत में रेल के आने से बुराई बढ़ जाएगी। क्योंकि जो बुरे लोग हैं, वो रेल से यात्रा करके एक जगह से दूसरी जगह आसानी से पहुंच सकेंगे और इससे बुराई आसानी से फैल सकेगी। दूसरा उनका ये भी कहना था कि इससे ज्यादा से ज्यादा लोग पवित्र स्थानों की यात्रा कर सकेंगे और इससे ये स्थान दूषित हो जाएंगे और तीसरा उन्हें ये भी डर था कि इससे Plague महामारी और ज्यादा फैल सकती है। इस विरोध की वजह से तब अंग्रेजों को भारत में रेल नेटवर्क बिछाने में काफी मुश्किल आई थी।हालांकि उन्होंने इस काम को रोका नहीं और आज अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क भारत में है जो 67 हजार 956 किलोमीटर लम्बा है।
हमें समझने वाली बात ये भी है कि महात्मा गांधी ने भारत में रेल चलाने का विरोध किया लेकिन कुछ वर्षों के बाद ही उन्हें समझ आ गया था कि रेल भारत के लिए कितनी जरूरी है और उन्होंने जितने भी आन्दोलन किए उनमें वो रेल से ही सफर करते थे।
आज भी अग्निपथ योजना का जो विरोध हो रहा है, उसमें ट्रेनों को ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया गया है। सोचिए, अगर इस विरोध की वजह से तब भारत में रेल नेटवर्क नहीं बिछाया जाता तो क्या होता और यहां बात सिर्फ ट्रेनों की नहीं है।
1980 के दशक में जब भारत में कंप्यूटर आया तो इसका भी विरोध हुआ था। उस समय विपक्षी पार्टियां इसके खिलाफ एकजुट हो गई थीं और पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टियों ने बहुत बड़ा आन्दोलन किया था। हालांकि इस विरोध के बावजूद भारत में कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू हुआ और लोगों ने इसे अपनाया और वर्ष 2004 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कंप्यूटर का विरोध करना उनकी बहुत बड़ी गलती थी। इससे ये पता चलता है कि जब-जब पुरानी व्यवस्था को बदल कर एक नई व्यवस्था लागू की जाती है और उसमें सुधार किए जाते हैं तो उसका तत्कालिक विरोध होता है लेकिन भविष्य में समझ आता है कि वो सुधार कितने जरूरी थे। जैसा कि हो सकता है कि आज जो लोग अग्निपथ योजना का विरोध कर रहे हैं, वही 10 साल के बाद ये कहें कि उन्होंने तब कितनी बड़ी गलती की थी। जब भी पुराने सिस्टम को तोड़ कर देश की भलाई के लिए कोई नया कानून या कोई नया बदलाव किया जाता है तो देश के अपने ही लोग विकास के उस रास्ते में आग लगा देते हैं और उसे अग्निपथ बना देते हैं। मेरे सामने कंप्यूटर से लेके अग्निपथ सब का विरोध हुआ है। जब भी कुछ बेहतर के लिए प्रयत्न होगा तब आप को सड़को पर तक़रीबन एक सा ही विरोध दिखेगा और इसे आंदोलन कहकर क्रांति-क्रांति खेलेंगे। वैसे यह आंदोलन है या विकास रोकने का प्रयास?
भारत जैसे देश में जहां सरकार तक़रीबन ८० करोड़ लोगो को निशुल्क अनाज उपलब्ध करा रही है वहां किसी का भी गुस्सा या विरोध षड़यंत्र लगने लगता है जब पता चले ३ से ४ दिन के बीच हुई हिंसा से भारतीय रेल को 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। इस हिंसा में प्रदर्शनकारियों ने ट्रेनों की 100 बोगियों को आग लगाई है। हर बोगी की कीमत दो करोड़ रुपये होती है। यानी इस हिसाब से जो युवा सेना में भर्ती होना चाहते हैं, उन्होंने 200 करोड़ रुपये की तो सिर्फ बोगियां जला दीं। इसके अलावा इस हिंसा में 7 रेल इंजन को भी जलाया गया है। एक इंजन की कीमत 15 करोड़ रुपये होती है। यानी इस हिसाब से 105 करोड़ के रेल इंजन जला दिए गए। सोचिए, ये युवा इन्हीं ट्रेनों में बैठकर सरकारी नौकरियों की परीक्षा देने के लिए जाते हैं और इन्होंने इन्हीं ट्रेनों में आग लगा दी। मेरी जानकारी के हिसाब से भारतीय रेल विश्व में सब से सस्ते में सेवा उपलब्ध कराती है। इस हिंसा में अब तक जितने भी लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें से कई युवा 25 से 30 साल के हैं। यानी ये वो युवा हैं, जो सेना में भर्ती हो नहीं सकते। क्योंकि सेना में 23 साल के बाद कोई युवा नहीं जा सकता। फिर यह कौन है?
अंतिम वाक्य, अग्निपथ योजना शुरू की है अनिवार्य नहीं ।












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