लाडनूं :साधु अपने जीवन भर के लिए सर्व सावद्य योग का तीन करण, तीन योग से त्याग कर देते हैं और उसका पालन करते हैं तो कितनी बड़ी साधना हो जाती है। साधु दूसरों के कल्याण के लिए भी प्रयास करता है। लोगों को धार्मिक उपदेश देकर सत्पथ पर ला देना, कल्याण की बात हो सकती है। पापों और व्यसनों में लगे हुए लोगों को उससे निकालकर धर्मपथ पर लाना, किसी को मंगलपाठ सुनाना, प्रवचन सुनाना- ये भी साधुओं द्वारा गृहस्थों पर परोपकार होता है। साधु अपने से छोटे साधुओं पर पढ़ाने, ज्ञान कंठस्थ कराने आदि का कार्य भी करते हैं।
संत हो अथवा गृहस्थ, सभी को अपने ज्ञान में निरंतर वृद्धि करने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान समय में योगक्षेम वर्ष चल रहा है। इसमें ज्ञान के इतने संसाधन, इतने ज्ञानी संत, साध्वियां आदि उपस्थित हैं। पुस्तकों, साहित्य व ग्रन्थों का भण्डार है। अनेक कक्षाएं संचालित हो रही हैं। इनके माध्यम से साधु, साध्वी व समणियों को अपने ज्ञान का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। कोई साधु-साध्वी दसवीं, बारहवीं, बीए, एमए, पीएचडी आदि करने का भी प्रयास होता है।
गृहस्थों की दृष्टि से भी देखें तो जीवन के प्रथम अवस्था, जिसे 25 वर्ष तक मान लें तो उसमें जिसने विद्या का अर्जन नहीं किया, 25 वर्ष के बाद की दूसरी अवस्था तो कमाई करने की अवस्था है। इसमें जिसने धन नहीं कमाया और तीसरे वय में जिसने धर्मार्जन नहीं किए तो फिर चौथे वय में भला क्या किया जा सकता है। वृद्धावस्था में कितना परिश्रम हो सकता है। अभी जो भी पच्चीस वर्ष से नीचे के साधु-साध्वियां व समणियां हैं, उन्हें ज्ञान के विकास का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
मनुष्य जीवन को मूल पूंजी मान लिया जाए तो जो आदमी अपने मनुष्य जीवन को व्यसनों में, चोरी में, लूट में, हत्या में आदि बुरे कार्यों में लगाता है, वह मरकर नरक और तिर्यंच गति में जा सकता है। वह आदमी मानों अपनी मूल पूंजी को भी गंवा देता है। एक आदमी होता है जो न तो ज्यादा पुण्यकर्म अथवा धर्म आदि के कर्म करता है और न ही बहुत ज्यादा पाप आचरण करता है, साधारण जीवन जीता है, वह मरकर वापस मनुष्य गति में आता है तो मानों उसने अपनी मूल पूंजी को सुरक्षित रख लिया। एक आदमी है, जिसने साधुपन स्वीकार कर लिया अथवा श्रावक बन गया हो और धर्म, ध्यान, तपस्या, साधना आदि के द्वारा अपने जीवन की मूल पूंजी को बढ़ाता है और मरकर फिर देव अथवा उससे भी उच्च गति की ओर चले जाते हैं। ऐसे लोग अपनी मूल पूंजी को बढ़ा लेते हैं। इसलिए अपनी मूल पूंजी को वृद्धिंगत करने का प्रयास करना चाहिए। उक्त पावन प्रेरणा जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को प्रदान की।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन से पूर्व साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया तो आचार्यश्री ने चतुर्विध धर्मसंघ को कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग कराया। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की अनुज्ञा से कुछ साध्वियों ने सेवा संदर्भित गीत का आंशिक संगान किया। कुछ दिनों पूर्व ही गुरु सन्निधि में पहुंची साध्वीवृंद ने संतवृंद से खमतखामणा की। संतवृंद की ओर से मुनि धर्मरुचिजी ने साध्वीवृंद के प्रति मंगलकामना की।












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