बेंगलुरु। कर्मचारियों के स्वैच्छिक सेवानिवृति पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी भी कर्मचारी के स्वैच्छिक सेवानिवृति के आवेदन पर विचार करने के लिए केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) द्वारा पारित निर्देश बाध्यकारी हैं और अधिकारी किसी भी कर्मचारी के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए दिए गए आवेदन पर विचार किए बिना अनिवार्य सेवानिवृत्ति का निर्देश नहीं दे सकते हैं।
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अनु शिवरामन और जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े की खंडपीठ ने इनकम टैक्स कमिश्नर बी अरुलप्पा के स्वैच्छिक सेवानिवृति से जुड़े विवाद में यह फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें केंद्र ने इनकम टैक्स कमिश्नर की स्वैच्छिक सेवानिवृति के आवेदन की जगह उनके खिलाफ अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ अरलप्पा ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का दरवाजा खटखटाया था।
CAT ने अपने आदेश में केंद्र सरकार के फैसले को पलट दिया था और इनकम टैक्स कमिश्नर के स्वैच्छिक सेवानिवृति के आवेदन के अनुसार हित लाभ देने का निर्देश दिया था। केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस अर्जी को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि CAT द्वारा पारित निर्देश बाध्यकारी हैं।
हाई कोर्ट ने कहा, “चूंकि कर्मचारी ने पहले ही नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी थी, इसलिए हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि न्यायाधिकरण द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने में केंद्र सरकार को परेशानी क्यों हो रही है।” पीठ ने कहा कि कर्मचारी ने तो खुद सेवा में बने रहने के विकल्प को खारिज किया है।
दरअसल, अरुलप्पा ने CIT-II के पदभार में रहते हुए त्रिची में कर निर्धारण वर्ष 2009-2010 के लिए मेसर्स वासन हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड के मामले को अपने सबसे कनिष्ठ इनकम टैक्स ऑफिसर को दे दिया था, जिसके परिणामस्वरूप 26.03.2018 को उनके खिलाफ मामूली जुर्माना कार्यवाही शुरू की गई थी। हालांकि, इससे पहले ही 29.09.2017 को उन्होंने विभागीय नियम 56(के) के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन दिया था, जो 28.12.2017 से प्रभावी होनी थी लेकिन उसे यह कहकर रोक दिया गया कि अभी विजिलेंस और वित्त मंत्री के यहां से क्लीयरेंस नहीं मिलने के कारण उनके आवेदन को खिज कर दिया गया। इसके बाद अरुलप्पा ने ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था, जहां उनके पक्ष में फैसला सुनाया गया था।













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