कोलकाता : अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने शनिवार को अपनी भारत यात्रा की शुरुआत कोलकाता से की। शहर पहुंचने के बाद उनका पहला प्रमुख कार्यक्रम मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय ‘मदर हाउस’ का दौरा रहा। इस दौरान उन्होंने संस्था के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उसके सेवा कार्यों की जानकारी ली।
रूबियो का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब मिशनरीज ऑफ चैरिटी और विदेशी चंदा विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हाल के वर्षों में संस्था का नाम विदेशी अनुदान संबंधी विवादों के कारण सुर्खियों में रहा है और अब अमेरिकी राजनीतिक हलकों में भी इस विषय पर चिंता व्यक्त की जा रही है।
मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना वर्ष 1950 में मदर टेरेसा ने की थी। संस्था देश और विदेश में गरीबों, अनाथों, बीमारों तथा बेसहारा लोगों के लिए सेवा कार्य संचालित करती है। हालांकि वर्ष 2021 में संस्था का एफसीआरए लाइसेंस नवीनीकरण न होने के कारण यह राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई थी। उस समय केंद्र सरकार ने लाइसेंस नवीनीकरण से इनकार करते हुए कुछ प्रतिकूल सूचनाओं का हवाला दिया था। बाद में आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के पश्चात संस्था को फिर से विदेशी चंदा प्राप्त करने की अनुमति मिल गई थी।
रूबियो की यात्रा से पहले अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद क्रिस स्मिथ ने भारत में प्रस्तावित एफसीआरए संशोधनों को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री से आग्रह किया था कि वह भारत सरकार के साथ होने वाली बैठकों में इस विषय को उठाएं। स्मिथ का तर्क है कि प्रस्तावित संशोधनों का प्रभाव विदेशी सहायता प्राप्त धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के संचालन पर पड़ सकता है।
केंद्र सरकार का कहना है कि एफसीआरए का उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। सरकार के अनुसार विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए जवाबदेही और नियामकीय निगरानी आवश्यक है।
मार्को रूबियो पिछले 14 वर्षों में कोलकाता का दौरा करने वाले पहले अमेरिकी विदेश मंत्री हैं। उनकी भारत यात्रा के दौरान व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग जैसे विषयों पर भी चर्चा होने की संभावना है। नई दिल्ली में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात करेंगे तथा क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी हिस्सा लेंगे।
विश्लेषकों का मानना है कि कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी का दौरा केवल एक सांकेतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह ऐसे समय में हुआ है जब धार्मिक संस्थाओं, विदेशी फंडिंग और नागरिक संगठनों की भूमिका को लेकर भारत और पश्चिमी देशों के बीच विमर्श जारी है। इसलिए रूबियो की इस यात्रा को कूटनीतिक महत्व के साथ-साथ राजनीतिक संकेतों के नजरिये से भी देखा जा रहा है।













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