लाडनूं : जैन विश्व भारती परिसर में बने भव्य एवं विशाल सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आज के निर्धारित विषय ‘शत्रु कौन है?’ को वर्णित करते हुए कहा कि भगवान गौतम व मुनि केशी कुमार श्रमण के मध्य हुई वार्ता के दौरान मुनि कुमार श्रमण केशी से प्रश्न किया कि आप इतने शत्रुओं से घिरे हुए हो, फिर आप अपराभूत लग रहे हो तो आपने उन शत्रुओं पर विजय कैसे प्राप्त की है?
उन्होंने फरमाते हुए कि एक को मैंने जीत लिया तो पांच पर विजय प्राप्त हो गई। पांच पर विजय प्राप्त कर ली तो मानों दस पर विजय प्राप्त हो गई। दस प्रकार के शत्रुओं को जीतकर सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। पुनः प्रश्न किया गया कि शत्रु कौन होता है? उत्तर प्रदान किया गया कि एक आत्मा जो न जीती हुई हो, वह शत्रु होती है। एक आत्मा शत्रु होती है तो उसके परिवार में चार कषाय, पांच इन्द्रियां भी शत्रु के समान ही होती हैं। इनको ज्ञात विधा के अनुसार जीत कर ही आगे बढ़ा जा सकता है। जब आत्मा को जीत लिया जाए तो चित्त में समाधि रह सकती, शांति रह सकती है। आत्मा को जीत लिया जाए, कषायों को परास्त कर लिया जाए और इन्द्रियों का संयम हो जाए तो अपार चित्त समाधि रह सकती है। यह बहुत बड़ी साधना होती है।
कषायों पर विजय प्राप्त करना बहुत बड़ी बात होती है। आदमी हो अथवा साधु, जहां तक संभव हो कषायों को जीतने का प्रयास करना चाहिए। कषाय विजय बहुत उच्च कोटि की साधना हो सकती है। पूर्ण विजय न भी हो, तो भी आदमी को जितना संभव हो सके, कषायों को जीतने और वीतरागता की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। साधु में सरलता, विनय का भाव हो, अहंकार का भाव न हो।
आदमी जो भी कार्य करे, उसमें पूर्ण रूप से ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए। चलना हो तो चलने में ही पूरा ध्यान रखने का प्रयास हो। भोजन करना हो तो भोजन में ही ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु को किसी भी स्थिति में धैर्य रखने का प्रयास करना चाहिए। सभी प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव हो। आहार का संयम भी रखने का प्रयास होना चाहिए।
साधु को अपनी वाणी का संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु ही नहीं आदमी को भी जहां तक संभव हो सके अपनी वाणी का संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार साधना होती है तो कषाय, इन्द्रिय आदि शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। आत्मा पर विजय प्राप्त होना आगे की बात हो सकती है, लेकिन जितना संभव हो सके, अपने इन्द्रियों पर संयम रखने का प्रयास होना चाहिए। जितना संभव हो सके, कषाय विजय करने का प्रयास होना चाहिए। सेवा लेने वाला में समता का भाव हो और सेवा देने वाले में भी समता, शांति का भाव हो तो सेवा का कार्य भी अच्छा हो सकता है। इस प्रकार न जीती हुई आत्मा, कषायों से युक्त आत्मा और अनियंत्रित इन्द्रियां शत्रु के समान हैं। इसलिए जितना संभव हो सके, कषायों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध, मान, माया, लोभ को कम करने, इन्द्रियों को जीतने का प्रयास करना चाहिए।













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