जयपुर : श्याम नगर स्थित भिक्षु साधना केन्द्र में आचार्य संत भीखण जी महाराज की जन्म त्रिशताब्दी समारोह श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुनि श्री तत्व रुचि जी “तरुण” ने कहा कि जहाँ लक्ष्य अटल और संकल्प प्रबल होता है, वहाँ पुरुषार्थ स्वतः सफल हो जाता है।
उन्होंने कहा कि आचार्य भीखण जी का परम लक्ष्य आत्म कल्याण था। इस हेतु उनका अडिग संकल्प था—“मर पूरा देस्या पिण आत्मा रा कारज सारस्या”, अर्थात आत्म कल्याण के लिए यदि प्राण भी न्योछावर करने पड़ें तो वे तत्पर हैं। इसी भाव के साथ वे जीवन पथ पर अग्रसर हुए। हर बाधा को मील का पत्थर मानते हुए उन्होंने निरंतर साधना की और अंततः सफलता ने स्वयं उनका वरण किया।
मुनि श्री ने धर्माराधना के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धर्म का सर्वोच्च लक्ष्य शांति है। जीवन में शांति का महत्व सर्वाधिक है। यदि सभी भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध हों, परंतु अंतर्मन में शांति न हो, तो वे सुविधाएँ भी सुख प्रदान नहीं कर सकतीं। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री भिक्षु का जीवन शांति और क्रांति का अद्वितीय समन्वय था। वे शांति के उपासक और धर्म क्रांति के पुरोधा थे।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री भिक्षु स्वामी का लक्ष्य अत्यंत स्पष्ट था—जो भी करना है, आत्मा की पवित्रता के लिए करना है। वे स्वयं संयम साधना के पथ पर चले और “संयम ही धर्म है” इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। जहाँ संयम का पोषण नहीं होता, वहाँ असंयम का समर्थन करना भी आत्मधर्म के विपरीत है।
मुनि श्री ने आगे कहा कि संयम शांति का मार्ग है और असंयम अशांति का कारण। जो व्यक्ति जीवन में स्थायी शांति की कामना करता है, उसे संयम की राह अपनानी चाहिए।
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान महावीर की स्तुति से हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेक्षाध्यान का प्रयोग करवाया गया। प्रत्याख्यान और मंगलगान के साथ समारोह का गरिमामय समापन हुआ।
भिक्षु साधना केन्द्र में आयोजित यह आध्यात्मिक आयोजन श्रद्धा, साधना और संयम की प्रेरणा देकर उपस्थित जनसमुदाय के लिए स्मरणीय बन गया।













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