संयुक्त राष्ट्र डेस्क : संयुक्त राष्ट्र में ‘इस्लामोफोबिया से निपटने के अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ के अवसर पर भारत ने पाकिस्तान को लेकर बेहद स्पष्ट और तीखा रुख अपनाया। भारत के स्थायी प्रतिनिधि परवथानेनी हरीश ने बिना किसी लाग-लपेट के पाकिस्तान की उस नीति को उजागर किया, जिसमें वह “इस्लामोफोबिया” के मुद्दे को एक सुनियोजित हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह एक “गढ़ी गई कथा” है, जिसका उद्देश्य दुनिया का ध्यान पाकिस्तान की अपनी गंभीर आंतरिक समस्याओं और मानवाधिकार उल्लंघनों से हटाना है।
ढोंग और हकीकत के बीच पाकिस्तान
भारत ने अपने वक्तव्य में पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को सामने रखते हुए कहा कि जो देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामोफोबिया का रोना रोता है, वही अपने देश में:
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अहमदिया समुदाय को बुनियादी धार्मिक पहचान से वंचित करता है
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अफगान शरणार्थियों को जबरन बाहर निकालता है
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सैन्य कार्रवाइयों के जरिए मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करता है
भारत का संदेश सीधा था—जो देश अपने ही नागरिकों के साथ न्याय नहीं कर सकता, वह वैश्विक नैतिकता का ठेकेदार बनने का अधिकार नहीं रखता।
अफगानिस्तान पर उठे गंभीर सवाल
भारत के इस बयान का समय भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। हाल ही में काबुल में कथित पाकिस्तानी हवाई हमलों की खबरों के बीच यह टिप्पणी आई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार एक बड़े पुनर्वास अस्पताल को निशाना बनाया गया, जहां पहले से ही कमजोर और बीमार लोग मौजूद थे। यदि यह सच साबित होता है, तो यह केवल सैन्य चूक नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी मानी जाएगी।
भारत ने तीखे शब्दों में सवाल उठाया—ऐसी कार्रवाई को दुनिया क्या नाम दे?
ओआईसी के मंच का राजनीतिक उपयोग
भारत ने पाकिस्तान द्वारा इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के मंच के दुरुपयोग पर भी सीधा हमला बोला।
भारत ने कहा कि पाकिस्तान बार-बार इस मंच का इस्तेमाल झूठे और भ्रामक आरोपों को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने के लिए करता है, लेकिन अब यह रणनीति कमजोर पड़ती जा रही है।
भारत ने यह भी रेखांकित किया कि उसके यहां 20 करोड़ से अधिक मुस्लिम नागरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान अधिकारों के साथ रहते हैं—जो पाकिस्तान के दावों को खुद ही खारिज करता है।
“असल समस्या इस्लामोफोबिया नहीं, असहजता है”
भारत ने अपने सबसे तीखे बयान में कहा कि पाकिस्तान की असली परेशानी इस्लामोफोबिया नहीं, बल्कि भारत की बहुलतावादी व्यवस्था है।
एक ऐसा समाज जहां विभिन्न धर्म न केवल साथ रहते हैं, बल्कि सम्मान के साथ फलते-फूलते हैं—यह मॉडल पाकिस्तान को स्वीकार्य नहीं है।
भारत ने इसे पाकिस्तान की “असुरक्षा” और “विभाजनकारी सोच” का परिणाम बताया।
संयुक्त राष्ट्र को भी चेतावनी
भारत ने इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र को भी एक स्पष्ट संदेश दिया।
भारत ने कहा कि केवल एक धर्म पर केंद्रित होकर नफरत के मुद्दों को उठाना वैश्विक संतुलन को बिगाड़ सकता है। इसके बजाय सभी प्रकार के धार्मिक भेदभाव—“धर्मद्वेष”—को समान रूप से संबोधित किया जाना चाहिए।
सभ्यता बनाम राजनीतिक अवसरवाद
भारत ने अपने दृष्टिकोण को “सर्व धर्म समभाव” की परंपरा से जोड़ते हुए खुद को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया, जहां सह-अस्तित्व कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है।
इसके विपरीत, पाकिस्तान का रवैया राजनीतिक और अवसरवादी नजर आता है।
अंतिम संदेश: अब दिखावा बंद हो
अपने समापन वक्तव्य में भारत ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र को राजनीतिक एजेंडों में उलझने के बजाय वास्तविक वैश्विक समस्याओं—संघर्ष, गरीबी और मानव गरिमा—पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
क्योंकि आज की दुनिया में न तो बनावटी नारों की जरूरत है, और न ही दोहरे मापदंडों की।













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