डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है कि कथित मेडिकल लापरवाही के मामलों में डॉक्टरों, अस्पतालों और स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के लिए एक स्पष्ट और प्रभावी कानूनी ढांचा अब तक क्यों नहीं बनाया गया। यह नोटिस समीक्षा फाउंडेशन– मेडिकल लापरवाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध बनाम भारत सरकार मामले की सुनवाई के दौरान जारी किया गया। भावी CJI जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि 2005 के जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य फैसले में दिए गए निर्देशों के बावजूद दो दशक में न केंद्र ने और न ही राज्यों ने आवश्यक गाइडलाइंस तैयार कीं।
2005 के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कानूनी ढांचा अधूरा
NGO समीक्षा फाउंडेशन की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (जो अब राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग—NMC—के रूप में कार्यरत है) से सलाह लेकर ऐसे दिशानिर्देश तैयार करने का आदेश था, जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि डॉक्टरों पर किसी स्वतंत्र चिकित्सा राय के बिना मुकदमा न चले और जल्दबाज़ी में गिरफ्तारियां न हों।
अब तक नहीं बने दिशानिर्देश
याचिका के अनुसार, अप्रैल 2025 में दायर एक RTI पर NMC ने जवाब दिया कि मेडिकल लापरवाही मामलों में गाइडलाइंस अब तक नहीं बनाई गई हैं और प्रक्रिया जारी है। याचिकाकर्ता ने इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के प्रति “गंभीर उदासीनता” बताया, जिसके कारण एक ऐसा कानूनी खालीपन बना है, जहाँ मरीजों के लिए कोई स्पष्ट रास्ता नहीं और डॉक्टरों के लिए कोई ठोस प्रक्रिया-सुरक्षा उपलब्ध नहीं।
‘डॉक्टर डॉक्टरों का मूल्यांकन कर रहे हैं’—यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं
याचिका में यह चिंता जताई गई कि 2005 के निर्देशों के अनुसार किसी भी डॉक्टर पर आपराधिक मुकदमा चलाने से पहले एक सक्षम सरकारी डॉक्टर की स्वतंत्र राय लेना अनिवार्य है। लेकिन व्यावहारिक रूप से कोई भी डॉक्टर दूसरे डॉक्टर के खिलाफ राय देने के लिए तैयार नहीं होता। इससे जांच अक्सर अधूरी रहती है और निर्णय अस्पष्ट। याचिकाकर्ता ने कहा कि जांच समितियों में ज़्यादातर डॉक्टर होने की वजह से निष्कर्ष एकरूप नहीं आते और ‘डॉक्टर डॉक्टरों को जज कर रहे हैं’ जैसी व्यवस्था से पीड़ित परिवारों को कोई वास्तविक सहारा नहीं मिलता।
संसद की स्थायी समिति पहले ही कर चुकी है सिफारिशें
याचिका में यह भी कहा गया कि 2013 में संसदीय स्थायी समिति ने आंतरिक जांच प्रणालियों पर लोगों के भरोसे में गिरावट को चिन्हित किया था। समिति ने सुझाव दिया था कि मेडिकल लापरवाही मामलों की जांच में मरीज प्रतिनिधियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, सिविल सेवकों और स्वतंत्र विशेषज्ञों का बड़ा पैनल होना चाहिए। लेकिन वर्षों से संसद में पूछे गए सवालों और समिति की अनुशंसाओं के बावजूद आपराधिक लापरवाही की जांच प्रक्रिया में कोई ठोस सुधार नहीं किया गया है।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद उम्मीद है कि सरकार को लंबे समय से लंबित इस कानूनी ढांचे पर स्पष्ट रुख अपनाना पड़ेगा।













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