भारत में जनसंख्या की धार्मिक संरचना को लेकर चर्चाएं नई नहीं हैं। समय-समय पर कई नेता इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यह दावा किया कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो 2041 तक असम में हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक हो जाएगा। तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने भी उत्तर प्रदेश, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में बदलती जनसंख्या संरचना को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
लेकिन यह चिंता सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। जनसंख्या में धार्मिक बदलावों को लेकर वैश्विक स्तर पर भी चर्चाएं चल रही हैं। प्यू रिसर्च सेंटर की हालिया रिपोर्ट इस ओर इशारा करती है कि 2010 से 2020 के दशक के बीच कई देशों में बहुसंख्यक धर्मों की पकड़ कमजोर हुई है। खासतौर पर ईसाई बहुल देशों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
घटते ईसाई बहुल देश
2010 में विश्व में 124 देश ऐसे थे जहां ईसाई बहुसंख्यक थे। लेकिन 2020 आते-आते यह संख्या घटकर 120 रह गई। यानी एक दशक में 4 देश ईसाई बहुल की श्रेणी से बाहर हो गए। इसकी मुख्य वजहें हैं—
- धर्मांतरण और धार्मिकता से दूरी,
- जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट, और
- बढ़ती नास्तिकता या अनीश्वरवाद।
जिन देशों में ईसाई जनसंख्या बहुसंख्यक नहीं रही, उनमें यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और उरुग्वे जैसे विकसित देश शामिल हैं।
– यूनाइटेड किंगडम में अब केवल 49% लोग ही खुद को ईसाई मानते हैं।
– ऑस्ट्रेलिया में यह आंकड़ा 47%,
– फ्रांस में 46% और
– उरुग्वे में मात्र 44% रह गया है।
विशेष रूप से उरुग्वे में अब 52% आबादी ऐसी है जो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखती। यही नहीं, नीदरलैंड और न्यूजीलैंड जैसे देशों में भी बहुसंख्यक आबादी अब किसी संगठित धर्म से नहीं जुड़ी हुई है। नीदरलैंड में 54% और न्यूजीलैंड में 51% लोग खुद को ‘धर्मनिरपेक्ष’ या ‘नास्तिक’ मानते हैं।
5% देश अब ‘धर्मनिरपेक्ष बहुल’
प्यू रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के लगभग 5% देश ऐसे हो चुके हैं, जहां बहुसंख्यक आबादी किसी भी संगठित धर्म को नहीं मानती। यह बदलाव पश्चिमी समाजों में तेजी से उभरती individualism, modernism, और scientific rationalism का परिणाम माना जा रहा है।
हिंदू धर्म का वैश्विक परिदृश्य
अगर हिंदू धर्म की बात करें, तो यह स्थिति और भी सीमित है। पूरी दुनिया में सिर्फ दो देश—भारत और नेपाल—हिंदू बहुल हैं। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया की कुल हिंदू आबादी का 95% हिस्सा अकेले भारत में निवास करता है। बाकी 5% आबादी विभिन्न देशों में बिखरी हुई है—जैसे मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और कुछ पश्चिमी राष्ट्रों में प्रवासी भारतीयों के रूप में।
दुनिया की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 15% है। इसके बावजूद यह धर्म वैश्विक राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श में अक्सर हाशिए पर रहता है।
निष्कर्ष: धार्मिक जनसंख्या का बदलता भूगोल
प्यू रिसर्च की रिपोर्ट यह साफ संकेत देती है कि आने वाले दशकों में वैश्विक धार्मिक मानचित्र में कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं। पश्चिमी देशों में जहां धार्मिकता तेजी से घट रही है, वहीं कुछ क्षेत्रों में खास धर्मों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक असंतुलन की आशंका भी जन्म ले रही है।
भारत जैसे देशों में यह मुद्दा केवल सांस्कृतिक चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक समरसता से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है। इसलिए यह सवाल फिर से खड़ा होता है—क्या हमें केवल जनसंख्या के आंकड़ों को देखना चाहिए, या उनके पीछे बदलती विचारधारा और पहचान के संकट को भी गंभीरता से समझना चाहिए?












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