लाडनूं : एक मुनिजी से पूछा गया कि आपका जलाशय कौन है, किसमें स्नान कर अपने रजों को दूर करते हैं? मुनिजी ने उत्तर दिया कि मेरा जलाशय धर्म है। जहां प्रसन्न लेश्या होती है। प्रसन्नता का एक अर्थ निर्मल भी होता है। स्वच्छ आकाश के लिए कहा जाता है कि आकाश प्रसन्न है। ऐसे जलाशय में मैं स्नान कर अपने रजों को धोता है। ब्रह्मचर्य मेरा शांति तीर्थ है। इस धर्म रूपी जलाशय में स्नान कर मैं विमल और विशुद्ध बन गया हूं और एकदम शांत हो गया हूं। यह स्नान ऋषियों के लिए प्रशस्त बताया गया है।
समान स्वच्छता के लिए पानी से स्नान करने वाले तो बहुत मिलते हैं। कोई नल के नीचे बाल्टी लगाके नहा लेता है तो कोई अन्य किसी माध्यम कुंआ, तालाब, नदी आदि में भी स्नान कर लेता है। सामान्य रूप से स्वच्छ होने के लिए स्नान की भी अपनी विधा होती है। इसका भी अपना महत्त्व हो सकता है। यह स्नान बाह्य स्नान अर्थात् शरीर का स्नान होता है। आत्मा का स्नान तो यहां बताया गया कि धर्म रूपी जलाशय में महास्नान महत्त्वपूर्ण है, जो ऋषियों के अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होता है। ऋषियों को धर्म के जलाशय में स्नान करने का प्रयास करना चाहिए।
एक अन्य माध्यम से कहा गया है कि आत्मा रूपी नदी में संयम रूपी पानी है। जहां सत्य का आगहन होता है, दया उसकी लहर और शील तप है, उसमें स्नान कर आत्मा का कल्याण हो सकता है। यह महास्नान ऋषियों के प्रशस्त बताया गया है। धर्म के जलाशय में स्नान करने का प्रयास करना चाहिए।
साधु के लिए प्रतिक्रमण भी एक रूप से स्नान ही है। इसको पूर्ण जागरूकता और ध्यान से करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार धर्म के जलाशय में स्नान करने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ भी पर्युषण के दौरान धर्म के रज में स्नान करते हैं। यह आत्मा की शुद्धि की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। उक्त पावन पाथेय रविवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने नित्य की भांति सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को प्रदान किया। आचार्यश्री योगक्षेम वर्ष के दौरान नित्य के लिए निर्धारित विषय को विवेचित करते हुए श्रद्धालुओं को विविध जीवनोपयोगी और आत्मा का कल्याण करने वाली प्रेरणा प्रदान करते हैं। आज आचार्यश्री ने आज के निर्धारित विषय ‘महास्नान ऋषियों का’ विषय को विवेचित किया।
मुनि मर्यादाकुमारजी व मुनि मेघकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने प्रेक्षाध्यान के शिविरार्थियों को शिविर के संदर्भ में उपसंपदा प्रदान कराई। साध्वी चेतनयशाजी, साध्वी मेरूप्रभाजी, साध्वी लोकोत्तरप्रभाजी, साध्वी जिज्ञासाप्रभाजी, समणी विनम्रप्रज्ञाजी ने भी अपने आराध्य की अभ्यर्थना में प्रस्तुति दी।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित भीलवाड़ा के सांसद श्री दामोदर अग्रवाल ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि योगक्षेम वर्ष के इस पावन काल में पूज्य प्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों में मैं विनम्र नमन करता हूं। मेरा सौभाग्य है कि ऐसे सुअवसर पर मुझे आपके दर्शन का सुअवसर मिला है। मैं आपके 65वें जन्मोत्सव व 17वें पट्टोत्सव पर अपने हृदय से शुभकामनाएं भी देता हूं। उन्होंने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती संस्थान की ओर से अखिल भारत वर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का आयोजन किया गया। अखिल भारत वर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री पवनकुमार गोयनका ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस सम्मेलन में उपस्थित लोगों को पावन आशीर्वाद प्रदान किया। इस कार्यक्रम का संचालन श्री रमेश खटेड़ ने किया।
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