नई दिल्ली : भारत अपनी रक्षा ताकत को लगातार मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में अब स्वदेशी तकनीक से विकसित ध्रुवास्त्र मिसाइल भारतीय सेना का हिस्सा बनने जा रही है। यह मिसाइल खास तौर पर दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए तैयार की गई है और इसे आधुनिक युद्ध का ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है।
ध्रुवास्त्र, दरअसल नाग एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) का हेलीकॉप्टर से दागा जाने वाला उन्नत संस्करण है। पहले इसे हेलिना (HELINA) नाम से जाना जाता था, लेकिन अब इसे नए नाम और अधिक उन्नत क्षमताओं के साथ सेना में शामिल किया जा रहा है।
कलाम के सपने से हकीकत तक का सफर
इस मिसाइल की जड़ें 1980 के दशक में शुरू हुए इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) से जुड़ी हैं। इस कार्यक्रम का नेतृत्व भारत के ‘मिसाइल मैन’ और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था। उनका सपना था कि भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने और आधुनिक हथियार खुद विकसित करे।
आज ध्रुवास्त्र उसी सोच का नतीजा है, जिसने दशकों बाद एक मजबूत और भरोसेमंद हथियार का रूप ले लिया है।
क्या बनाता है ध्रुवास्त्र को खास?
ध्रुवास्त्र मिसाइल कई अत्याधुनिक तकनीकों से लैस है, जो इसे युद्ध के मैदान में बेहद घातक बनाती हैं—
- फायर एंड फॉरगेट तकनीक: एक बार लक्ष्य लॉक करने के बाद मिसाइल खुद ही उसे ढूंढकर नष्ट कर देती है।
- टॉप अटैक क्षमता: यह दुश्मन के टैंक के ऊपर से हमला करती है, जहां उसकी सुरक्षा सबसे कमजोर होती है।
- लंबी मारक दूरी: करीब 7 किलोमीटर तक लक्ष्य को निशाना बना सकती है।
- बेहतर पैठ क्षमता: मजबूत स्टील और कवच को भी आसानी से भेद सकती है।
- हर मौसम में कारगर: दिन हो या रात, गर्मी हो या बर्फबारी—हर परिस्थिति में सटीक वार करती है।
लद्दाख जैसे इलाकों में मिलेगा फायदा
इस मिसाइल को खास तौर पर ऊंचाई वाले और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। लद्दाख जैसे इलाकों में, जहां टैंक युद्ध की संभावना रहती है, वहां यह मिसाइल भारतीय सेना के लिए बड़ी ताकत साबित होगी।
इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के रुद्र और प्रचंड जैसे अटैक हेलीकॉप्टरों से दागा जा सकता है। इससे सेना को हवाई हमले के जरिए दुश्मन के टैंकों को नष्ट करने की क्षमता मिलती है।
आयात पर निर्भरता होगी कम
सरकार पहले ही बड़ी संख्या में ध्रुवास्त्र मिसाइलों की खरीद को मंजूरी दे चुकी है। इससे भारत को विदेशी एंटी-टैंक मिसाइलों पर निर्भरता कम करनी पड़ेगी।
यह कदम ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहल को भी मजबूत करता है, जिससे देश की रक्षा उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी।
आगे क्या?
ध्रुवास्त्र की सफलता के बाद अब DRDO और भी उन्नत तकनीक पर काम कर रहा है। भविष्य में SANT (Stand-off Anti-Tank) जैसी मिसाइलें विकसित की जा रही हैं, जिनकी मारक क्षमता और दूरी दोनों अधिक होंगी।













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