जबलपुर का यह हादसा किसी साधारण दुर्घटना की तरह नहीं देखा जा सकता। यह एक ऐसी तस्वीर है, जिसमें पानी से ज्यादा गहराई इंसानी दर्द की है, और लहरों से ज्यादा वजन एक मां की आखिरी कोशिश का है।
बरगी डैम में जो हुआ, वह कुछ सेकंड का पल नहीं था। वह एक पूरा संघर्ष था—जीवन और मौत के बीच, और उस संघर्ष के केंद्र में एक मां थी। उसके पास लाइफ जैकेट थी, लेकिन वह खुद को नहीं बचा रही थी। वह अपने बच्चे को बचा रही थी। यही इस घटना का सबसे कठोर, सबसे भारी और सबसे असहनीय सच है।
कहते हैं लाइफ जैकेट इंसान को पानी पर तैराए रखती है। लेकिन उस दिन पानी ने नियम नहीं माने। उस दिन एक मां ने भी नियम नहीं माने। उसने खुद को नहीं चुना। उसने अपने बच्चे को चुना। और यहीं से यह हादसा सिर्फ डूबने की घटना नहीं रह जाता, यह ममता की उस हद में बदल जाता है जहां जीवन बचाने की कोशिश ही मृत्यु बन जाती है।
सवाल यह नहीं है कि पानी कितना तेज था। सवाल यह है कि वह नाव वहां थी ही क्यों, जब मौसम चेतावनी दे रहा था? सवाल यह है कि जब क्षमता तय थी, तो उससे ज्यादा लोग क्यों सवार थे? और सबसे बड़ा सवाल—जब सब कुछ गलत होता दिख रहा था, तब रोकने वाला कौन था?
क्योंकि अगर उस एक निर्णय की जगह जिम्मेदारी होती, अगर उस एक पल में सिस्टम सक्रिय होता, तो शायद वह मां आज जिंदा होती। शायद वह बच्चा भी बच जाता।
लेकिन अब जो बचा है, वह सिर्फ एक तस्वीर नहीं है। वह एक सवाल है—जो हर प्रशासनिक दावे के सामने खड़ा है। एक मां जिसने आखिरी सांस तक अपने बच्चे को नहीं छोड़ा, वह आज पूरे सिस्टम से पूछ रही है कि जब मैं नहीं छोड़ी, तो तुमने क्यों छोड़ दिया?
यह सवाल किसी जांच रिपोर्ट में बंद नहीं हो सकता। यह सवाल किसी बयान से खत्म नहीं हो सकता। क्योंकि यह सवाल उस दर्द से पैदा हुआ है, जहां ममता भी हार गई और व्यवस्था भी जवाब देने से चूक गई।
आज बरगी डैम का पानी शांत है, लेकिन उसके नीचे एक चीख दबी है—एक मां की, और उस सिस्टम की भी, जो हर बार कहता है कि सब कुछ नियंत्रण में था।













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