जयपुर : निर्माण नगर स्थित महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल के नवनिर्मित संबोधि सभागार में रविवार को आयोजित धर्मसभा में जैन संत मुनि श्री तत्त्व रुचि विजय ने “क्षमा वीरस्य भूषणम्” विषय पर विशेष प्रवचन देते हुए कहा कि क्षमा केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो सबल, समर्थ और शूरवीर हो। उन्होंने कहा कि क्षमावान व्यक्ति ही वास्तव में महान होता है, क्योंकि क्षमा के लिए दूसरों की गलतियों और कमियों को सहन करने की उदारता तथा अपने अहंकार का त्याग आवश्यक है।
मुनि श्री ने कहा कि गलती करना मानव की प्रकृति है, गलती को स्वीकार न करना विकृति है और अपनी भूल को सुधार लेना संस्कृति का परिचायक है। उन्होंने कहा कि रूठने वाला छोटा हो सकता है, किंतु मनाने वाला सदैव बड़ा होता है। जीवन की क्षणभंगुरता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को बैर-विरोध छोड़कर सभी के प्रति मैत्रीभाव रखना चाहिए। क्षमा करने से तनाव, बेचैनी और मानसिक अशांति दूर होती है तथा जीवन में हल्कापन और शांति का अनुभव होता है।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार ने कहा कि क्षमा भाव प्रसन्नता का वास्तविक अमृत है। क्षमा से मनुष्य को आंतरिक आनंद और आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है। उन्होंने कहा कि अहंकार क्षमा का सबसे बड़ा शत्रु है। अहंकारी व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित और नाराज हो जाता है, जबकि विनम्रता और क्षमाशीलता से इन दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
उन्होंने सहनशीलता का संदेश देते हुए कहा कि जो कार्य रूमाल से संपन्न हो सकता हो, वहां रिवॉल्वर का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार जो गांठें सहजता से खुल सकती हों, वहां कैंची का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जीवन में समस्याओं को उलझाने के बजाय उन्हें सुलझाने का प्रयास करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर विमल प्रभु की मंगल स्तुति से हुआ। श्रद्धालुओं ने तप, जप और ध्यान के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया। “विसर्जन” नामक गेय व्याख्यान की प्रभावी व्याख्या के माध्यम से संयम और त्याग का संदेश दिया गया। अंत में मंगल, उत्तम एवं शरण सूत्रों के सामूहिक उच्चारण के साथ धर्मसभा का समापन हुआ।













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