पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधानमंत्री इमरान खान की बढ़ती लोकप्रियता पाकिस्तानी सेना के लिए खतरा बनती जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, इमरान की पॉपुलैरिटी ने देश की जनता के साथ आर्मी के संबंधों पर असर डाला है। सेना की ओर एक ऐसे व्यक्ति का चयन करना विडंबना ही है, जो उसके ही पतन का कारण बन जाए। अतीत में अक्सर इसके विपरीत होता रहा है। 1976 में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) के तौर पर नियुक्त किया था। इसके अगले साल ही जिया ने उन्हें अपदस्थ कर दिया और बाद में भुट्टो को फांसी पर भी लटका दिया गया।
इसी तरह, नवाज शरीफ ने 1998 में जनरल परवेज मुशर्रफ को नियुक्त किया था। इसके अगले ही साल यानी 1999 में मुशर्रफ ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। हालांकि, इस बार भुट्टो की तरह नवाज को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ा। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के प्रमुख इमरान खान की कहानी इसके उलट है। इमरान को पाकिस्तानी राजनीति के शिखर तक स्थापित करने में सेना की बड़ी भूमिका मानी जाती है। खान जैसी पहले से ही मशहूर शख्सियत और ज्यादा लोकप्रिय बनाने में सैन्य ताकतों का साथ मिलता रहा। हालांकि, सेना को अब यह एहसास होने लगा है कि आखिर कैसे पीटीआई चीफ का बढ़ता दायरा उनके लिए खतरा बन सकता है।
बाजवा के बाद मुनीर की खान ने बढ़ाई टेंशन
पाकिस्तान में सबसे शक्तिशाली संस्थान के शीर्ष पर 6 साल तक जनरल कमर जावेद बाजवा काबिज रहे। नवंबर 2022 के अंत में जनरल असीम मुनीर को देश के सेनाध्यक्ष (COAS) के रूप में बाजवा का उत्तराधिकारी चुना गया। इमरान खान बाजवा के बाद अब मुनीर के लिए बड़ी टेंशन बनते जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मुनीर ने देश में चल रहे उथल-पुथले के दौरान पदभार ग्रहण किया है। एक तरफ जहां मौजूदा सरकार 2023 में ‘विवादास्पद चुनावों’ की तैयारी कर रही है, वहीं सैन्य ताकतें रणनीतिक चुनौतियों से जूझ रही हैं।
मुनीर और गठबंधन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इमरान खान की लोकलुभावन बयानबाजी है। खान ने देश की आर्थिक और मानवीय तबाही के पीछे सेना का हाथ होने का आरोप लगाया है। विपक्ष के नेता अपनी रैलियों में यह दावा भी कर रहे हैं कि उनके पतन के पीछे सेना का ही हाथ है। नवंबर की शुरुआत में खान के ऊपर हुए जानलेवा हमले से उनके इस दावे को काफी हद तक मजबूती मिली है। इमरान लगातार एक के बाद एक रैलियां करते जा रहे हैं और सेना के खिलाफ उनके हमले और तेज हो रहे हैं। इन रैलियों में हजारों की तादाद में उनके समर्थक भाग लेते हैं। इस तरह मौजूदा सरकार और सेना की हताशा बढ़ रही है।













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