जयपुर : निर्माण नगर स्थित महाप्रज्ञ इंटरनेशनल के संबोधि सभागार में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने अपने ओजस्वी प्रवचन में संगति के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि “जैसी संगत – वैसी रंगत” केवल एक लोकोक्ति नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य है। उन्होंने बताया कि जैसे वस्त्र जिस रंग में डाला जाए, उसी रंग में रंग जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी जिस संगति में रहता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व बन जाता है।
मुनि श्री ने कहा कि महान व्यक्तियों की संगति का प्रभाव इतना शक्तिशाली होता है कि साधारण व्यक्ति भी असाधारण बन सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे पुष्पमाला में जुड़ने पर साधारण सूत भी सिर पर धारण किया जाता है, वैसे ही श्रेष्ठ संगति मनुष्य को सम्मान और ऊँचाई प्रदान करती है।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी संगति के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य अपने परिवेश और साथियों से अत्यधिक प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि सदैव सत्यनिष्ठ और सदाचारी व्यक्तियों की संगति में रहना जीवन को सही दिशा देता है, जबकि कुसंगति पतन का कारण बनती है।
उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से बताया कि कैसे डाकू अंगुलिमाल को गौतम बुद्ध की संगति, हत्यारे अर्जुनमालाकार को भगवान महावीर का सान्निध्य, क्रूर राजा प्रदेशी को श्रमण केशी का मार्गदर्शन और लुटेरे वाल्मीकि को संतों की संगति मिली, जिससे उनके जीवन में अद्भुत परिवर्तन आया।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर अजीतनाथ प्रभु की स्तुति के साथ हुआ, जिसके पश्चात श्रद्धालुओं ने प्रवचनों का लाभ उठाया और आध्यात्मिक वातावरण में आत्मचिंतन का अनुभव किया।













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