जब जीवन की आपाधापी मन को थका देती है, जब चिंताओं का अंधकार आत्मा को घेरने लगता है और जब मनुष्य स्वयं को परिस्थितियों के सामने असहाय अनुभव करने लगता है, तब सनातन परंपरा उसे ईश्वर की शरण में लौटने का मार्ग दिखाती है। ऐसे ही पावन अवसरों में से एक है प्रदोष व्रत, जो भगवान शिव की आराधना का अत्यंत पुण्यदायी पर्व माना जाता है।
जून 2026 में प्रदोष व्रत दो बार आएगा। पहला प्रदोष व्रत 12 जून को और दूसरा 27 जून को रखा जाएगा। शास्त्रों में कहा गया है कि त्रयोदशी तिथि की संध्या बेला, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है, स्वयं भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि इसी समय समस्त देवता कैलाश पर उपस्थित होकर महादेव की आराधना करते हैं।
प्रदोष का आध्यात्मिक अर्थ
‘प्रदोष’ शब्द का अर्थ है—दोषों का क्षय। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का साधन है। मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे अनेक दोष निवास करते हैं। प्रदोष व्रत इन आंतरिक विकारों को पहचानने और उन्हें शिवचरणों में समर्पित करने की प्रेरणा देता है।
भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है, किंतु उनका संहार विनाश का नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार और पापों के नाश का प्रतीक है। इसलिए प्रदोष व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है।
क्यों विशेष है प्रदोष काल?
संध्या का समय दिन और रात्रि के मिलन का क्षण होता है। यह परिवर्तन का समय है। ऋषियों ने इसे साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना है। प्रदोष काल में की गई शिव उपासना मन को स्थिर करती है और साधक को भीतर की शांति का अनुभव कराती है।
पुराणों में वर्णित है कि इस समय भगवान शिव नटराज रूप में दिव्य तांडव करते हैं और समस्त सृष्टि उनकी चेतना से स्पंदित होती है। इसलिए प्रदोष काल में किया गया मंत्रजाप, ध्यान और प्रार्थना विशेष फलदायी मानी गई है।
केवल व्रत नहीं, आत्मचिंतन का अवसर
आज अधिकांश लोग व्रत को केवल भोजन त्यागने तक सीमित कर देते हैं, जबकि व्रत का वास्तविक अर्थ है—स्वयं को अनुशासन में बांधना। प्रदोष व्रत हमें कुछ समय के लिए सांसारिक व्यस्तताओं से ऊपर उठकर अपने भीतर झांकने का अवसर देता है।
क्या हमारे विचार शुद्ध हैं?
क्या हमारे व्यवहार में करुणा है?
क्या हम अपने अहंकार पर नियंत्रण रख पा रहे हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रेरणा ही प्रदोष व्रत का वास्तविक संदेश है।
शिव की ओर लौटने का निमंत्रण
भगवान शिव को आशुतोष कहा गया है—अर्थात् जो शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें वैभव नहीं चाहिए, केवल श्रद्धा चाहिए। एक लोटा जल, कुछ बेलपत्र और निष्कपट भाव से की गई प्रार्थना भी उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त मानी गई है।
जून माह के ये दोनों प्रदोष व्रत हमें स्मरण कराते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और ईश्वर के प्रति समर्पण में निहित है। यदि हम इस अवसर पर कुछ क्षण भी सच्चे मन से शिव का स्मरण कर लें, तो संभव है कि हमारे भीतर का अंधकार स्वयं प्रकाश में बदल जाए।
हर हर महादेव।













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