डेस्क : समाजवादी पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर अपनी रणनीति को ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 29 मार्च से ‘समाजवादी समानता भाईचारा रैली’ की शुरुआत नोएडा के दादरी से करेंगे। यह रैली चरणबद्ध तरीके से प्रदेश के सभी जिलों में आयोजित की जाएगी। अभियान के समन्वय और संचालन की ज़िम्मेदारी पार्टी प्रवक्ता राजकुमार भाटी को सौंपी गई है।
नोएडा से रैली की शुरुआत को सपा की राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि गौतमबुद्धनगर और आसपास के इलाकों को अब तक सपा का कमजोर क्षेत्र माना जाता रहा है। ऐसे में यहां से अभियान की शुरुआत कर पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने कमजोर माने जाने वाले गढ़ों में भी संगठनात्मक मज़बूती के साथ उतरने को तैयार है। सपा का आकलन है कि इन क्षेत्रों में संगठन को मज़बूत करने से प्रदेश की चुनावी गणित में निर्णायक बदलाव आ सकता है।
विधानसभा चुनावों में करीब 11 महीने शेष रहते हुए शुरू हो रही यह रैली 2022 के चुनावों में हार झेलने वाली विधानसभा सीटों पर विशेष फोकस करेगी। पार्टी नेताओं को स्थानीय स्तर पर तैयारियों में जुटा दिया गया है, ताकि जनसंपर्क और संगठन विस्तार के जरिए सपा अपनी खोई हुई ज़मीन वापस पा सके।
इसी के साथ समाजवादी पार्टी ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। पार्टी जिलों से फीडबैक रिपोर्ट मंगा रही है और संभावित प्रत्याशियों को लेकर सर्वे कराए जा रहे हैं। टिकट वितरण में जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय स्वीकार्यता और एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) जैसे अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेताओं को प्राथमिकता देने की रणनीति अपनाई जा रही है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, नोएडा से अभियान की शुरुआत को सपा 2012 के चुनावी अनुभव से जोड़कर देख रही है। उस समय अखिलेश यादव ने गौतमबुद्धनगर से साइकिल यात्रा शुरू की थी और उसी वर्ष पार्टी ने सत्ता हासिल की थी। हालांकि नोएडा को लेकर लंबे समय से एक राजनीतिक मिथक भी रहा है कि जो भी मुख्यमंत्री यहां आता है, वह कुछ ही महीनों में सत्ता गंवा देता है। इसी वजह से अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अखिलेश यादव नोएडा नहीं गए थे। 2017 और 2022 में भी उन्होंने चुनावी अभियानों की शुरुआत अन्य जिलों से की, लेकिन सत्ता से दूरी बनी रही।
अब एक बार फिर नोएडा से अभियान की शुरुआत कर समाजवादी पार्टी उस पुराने ‘शुभ संकेत’ को दोहराने की कोशिश में है, ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में राजनीतिक समीकरण अपने पक्ष में मोड़े जा सकें।













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