जयपुर : श्यामनगर स्थित भिक्षु साधना केन्द्र में शनिवार को आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने सुख-दुःख के वास्तविक कारण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख का मूल कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसके मन के संकल्प-विकल्प हैं। उन्होंने कहा कि जब मन में शुभ विचार और सकारात्मक विकल्प उत्पन्न होते हैं तो सुख की अनुभूति होती है, जबकि नकारात्मक विचार और अशुभ विकल्प दुःख का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि निर्विकल्प अवस्था ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ने कहा कि सामान्य व्यक्ति के लिए एकदम से विकल्पों से मुक्त होना सहज नहीं है। इसलिए साधना का प्रथम चरण बुरे विचारों और नकारात्मक विकल्पों से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए शुभ संकल्पों का आश्रय लेना उपयोगी है। जब साधक अशुभ विचारों की श्रृंखला से मुक्त हो जाता है, तब उसे शुभ-अशुभ दोनों प्रकार के विकल्पों से ऊपर उठने का अभ्यास करना चाहिए। यही दुःख से मुक्ति की वास्तविक साधना है।
इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि सभी विकल्पों की जननी ममता है। व्यक्ति किसी को प्रिय और किसी को अप्रिय मानता है, जिसका मूल कारण ममता का भाव है। प्रिय वस्तु अथवा व्यक्ति से सुख और अप्रिय से दुःख की अनुभूति होती है। उन्होंने कहा कि समता की साधना ही जीवन की सभी समस्याओं का समुचित समाधान प्रस्तुत करती है। धार्मिक जीवन का उद्देश्य ममता का परित्याग कर समता को धारण करना होना चाहिए, क्योंकि यही वास्तविक सुख, शांति और आत्मिक संतुलन का मार्ग है।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में संतों ने तीर्थंकर मुनिसुव्रत स्वामी की स्तुति का सामूहिक गान किया। इसके पश्चात उपस्थित श्रद्धालुओं को द्रष्टा भाव विकसित करने के उद्देश्य से श्वास साधना एवं महाप्राण ध्वनि का अभ्यास कराया गया। कार्यक्रम का समापन तप-प्रत्याख्यान तथा मंगलपाठ के साथ श्रद्धापूर्वक संपन्न हुआ।













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