एक बार असुर हयग्रीव ने ब्रह्मा से वेदों को चुरा लिया। इसके परिणामस्वरूप सृष्टि में अनाचार और अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य अवतार धारण कर हयग्रीव का वध करके उसके चंगुल से वेदों को मुक्त किया। मत्स्य रूप में भगवान विष्णु का पृथ्वी पर यह पहला अवतार चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था।
कल्पांत के पूर्व एक धार्मिक और पुण्यात्मा राजा सत्यव्रत थे। एक बार राजा कृतमाला नदी में स्नान कर रहे थे। उन्होंने तर्पण करने के लिए अंजलि में जल लिया तो उसमें एक छोटी-सी मछली भी आ गई। यह देख राजा ने मछली को जल में छोड़ना चाहा तो मछली ने राजा से कहा, ‘राजन, मेरे प्राणों की रक्षा करो। जल में बड़े-बड़े जानवर मुझे मारकर खा जाएंगे।’ यह सुन राजा के दिल में दया आ गई। उन्होंने उसे अपने जल से भरे कमंडल में डाल लिया। लेकिन रात में ही मछली का आकार इतना बढ़ गया कि उसके लिए कमंडल छोटा पड़ने लगा। यह देख राजा ने उसे दूसरे पात्र में रख दिया। इस तरह राजा ने मछली को सरोवर, नदी से होते-होते समुद्र में डाल दिया। लेकिन उस मछली के लिए समुद्र भी छोटा पड़ गया। तब राजा ने चकित होकर पूछा कि जिस गति से आपका शरीर बढ़ रहा है, इससे लगता है कि आप ईश्वर हैं। तब मत्स्य ने उत्तर देते हुए कहा कि मैं विष्णु हूं। असुर हयग्रीव ने वेदों को चुरा लिया है और समस्त लोकों में अत्याचार कर रहा है। उसका वध करके मैं वेदों को मुक्त करवाऊंगा। आज से सातवें दिन पृथ्वी पर जल प्रलय आएगी। तब आपके पास एक नौका आएगी। आप उसमें सप्त ऋषियों सहित सभी अनाज और औषधियों के बीजों के साथ उसमें बैठ जाइए। उस समय मैं पुन: आऊंगा और आपको आत्म तत्व का ज्ञान प्रदान करूंगा।
सात दिन के बाद आई जल प्रलय ने पूरी पृथ्वी को नष्ट करना शुरू कर दिया। यह देखकर भगवान विष्णु मत्स्य अवतार के रूप में प्रकट हुए और वासुकी की सहायता से नौका को अपने सींग से बांध दिया। मछली राजा मनु और सप्त ऋषियों सहित अनाज तथा औषधियों के बीजों को हिमालय के शिखर पर सुरक्षित ले गई। इसके पश्चात भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में सत्यव्रत को आत्म तत्व का ज्ञान देते हुए कहा, ‘सभी प्राणियों में, मैं ही निवास करता हूं। न कोई ऊंच है, न नीच। सभी प्राणी एक समान हैं। जगत नश्वर है। नश्वर जगत में मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है। जो प्राणी मुझे सबमें देखता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह अंत में मुझमें ही मिल जाता है।’
मत्स्य रूपी भगवान से आत्म तत्व का ज्ञान पाकर सत्यव्रत जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने उस दैत्य को मारकर, उससे वेद वापिस ले लिए और ब्रह्मा जी को पुन: वेद दे दिए।












मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
