मुंबई: आगम रूपी ज्ञान के खजाने से नित्य प्रति श्रद्धालुओं की झोली को भरने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अणुव्रत यात्रा प्रणेता, राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में भारत की मायानगरी मुम्बई के नन्दनवन में पांच महीने का चतुर्मास कर रहे हैं। एक महीने का समय व्यतीत हो जाने के बाद बरसात ने लोगों को थोड़ी राहत प्रदान की है। हालांकि अब भी प्रायः पूरे दिन आसमान उमड़ते बादलों से घिरा हुआ रहता है और यदा-कदा सावन की फुहारें भी आती हैं, किन्तु मूसलाधार बरसात में कमी आई है। दूसरी ओर राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी के श्रीमुख से आगमवाणी की झड़ी लगातार मुम्बई की जनता के मानस को अभिसिंचन प्रदान कर रही है और इसी अभिसिंचन को प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु जनता अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में पहुंचती है। मुम्बईवासियों के अलावा भी देश के विभिन्न हिस्सो से श्रद्धालु अपने आराध्य के स्थायी दर्शन-सेवा-उपासना का लाभ नन्दवन में प्राप्त कर रहे हैं।
शुक्रवार को तीर्थंकर समवसरण से राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भगवती सूत्र आगम के आधार पर मंगल देषणा देते हुए कहा कि जैन आगमों में वर्णित आठ कर्मों में अंतिम कर्म है अंतराय। यहां प्रश्न किया गया कि अंतराय शरीर कर्म प्रयोग बंध किन कारणों से होता है। उत्तर प्रदान करते हुए बताया गया कि अंतराय कर्म बंध के पांच हेतु बताए गए हैं- दानांतराय, लाभांतराय, भोगांतराय, उपभोगांतराय व वीर्यांतराय। इन पांच कारणों से अंतराय कर्म का बंध होता है। जैसा करना वैसा भरना होता है, ऐसा कर्मवाद का सिद्धांत है। यदि कोई किसी के किसी भी प्रकार के कार्य में बाधा डालता है तो उसे भी अपने जीवन में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। कोई दान में बाधा डाले तो यह दानांतराय होता है। दुनिया में दान के भी अनेक प्रकार होते हैं। ज्ञान का दान, धन का दान, औषधि, अन्न, भूमि, भवन आदि-आदि। इसमें भी लौकिक और आध्यात्मिक दान की बात आती है। किसी भूखे को भोजन कराना, अन्न का दान देना, अर्थ का दान देना अथवा भूमि आदि का दान देना लौकिक दान और ज्ञान का दान देना, अभयदान देना और शुद्ध साधु को शुद्ध दान देना आध्यात्मिक दान होता है। आदमी को किसी भी प्रकार के दान आदि में बाधा डालने से बचने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञानदान, साधु को शुद्ध दान और अभयदान देना धर्म दान है। दान में अंतराय पैदा करने से दानांतराय का बंध होता है। आदमी को इससे बचने का प्रयास करना चाहिए।
लाभांतराय का अर्थ जिसे प्राप्त न हो। कई बार प्रयास करने के बाद भी लाभ की प्राप्ति न हो, व्यापार-धंधे आदि लाभ न होना, भोजन का प्राप्त न होना आदि लाभांतराय के कारण होता है। जब कोई किसी दुर्भावनावश किसी के व्यापार-धंधे में बाधा डालना, किसी के आहार-पानी आदि में बाधा डालना, भिक्षा, गोचरी आदि में बाधा डालने से लाभांतराय बंध होता है। आदमी को इससे भी बचने का प्रयास करना चाहिए। दुर्भावनावश किसी के सुख में अंतराय डालने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को भोगांतराय, उपभोगांतराय और वीर्यांतराय से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी अपने जीवन में यह प्रयास करे कि दुर्भावनावश किसी के कार्य में अंतराय में बाधा न डालने का प्रयास करे तो अंतराय कर्म बंध से बच सकता है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने समुपस्थित जनता को कालूयशोविलास के माध्यम से आचार्यश्री कालूगणी की मालवा प्रदेश की यात्रा, उस दौरान होने वाले विरोध, फिर रतलाम में चार दिवसीय प्रभावक प्रवास आदि प्रसंगों का सरसशैली में वर्णन किया।
राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में पांच अगस्त से जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में तेरापंथ एनआरआई समिट का शुभारम्भ होगा। इस समिट में भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी धरा पर रहने वाले अप्रवासी भारतीय श्रद्धालु पहुंच रहें हैं। यह समिट दूर देशों में रहने वाले श्रद्धालुओं को अपने आराध्य और अपने धर्मसंघ से निकटता के साथ जोड़े रखने का सुन्दर माध्यम है। द्विदिवसीय समिट में अप्रवासी भारतीय आध्यात्मिक-धार्मिक लाभ उठाएंगे।
मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने फरमाया कि समय का ध्यान रखकर धार्मिक कार्य का उपयोग समय अनुसार करेंगे तो जीवन की दिन चर्या सही रहेगी । “टाइम मैनेजमेंट इज बेस्ट ऑफ़ लाइफ” – जब व्यक्ति अपने जीवन की शुरुवात काल में धार्मिक कार्य समयनुसार करेगा ,समय पर जगना , समय पर सामायिक करेगा और उसके बाद अपने नित्य काम करेगा तो उसका पूरा दिन ऊर्जावान जरूर होगा । आत्मा ज्ञान का अविरल बल हे, जिन शासन श्री तुलसी सदा विजय हो । धर्म संघ की प्रभावना से संघ के धार्मिक कार्य करने से श्रावक समाज के व्यक्ति में संघ की विशेष प्रभावना होगी । मुनि जिनेश कुमार जी जो हाल में साउथ हावड़ा में विराजित है वो सर्दी के समय में ऊनी वस्त्र उपयोग में नहीं लेते है यह भी एक धर्म संघ की प्रभावना का उदाहरण है । राग द्वेष से मुक्त होकर रहोगे तो परीवार में कभी भी विघटन नहीं होगा ।













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