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पहली हार, लंबी लड़ाई: राजनीति में भोजपुरी सितारों की चुनौतीपूर्ण शुरुआत

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Home ओपिनियन

पहली हार, लंबी लड़ाई: राजनीति में भोजपुरी सितारों की चुनौतीपूर्ण शुरुआत

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
November 15, 2025
in ओपिनियन, राजनीतिक
Reading Time: 1 min read
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भोजपुरी सितारों की चुनौतीपूर्ण शुरुआत

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भोजपुरी सिनेमा में मिली लोकप्रियता राजनीति में सफलता की गारंटी नहीं होती। रील लाइफ़ के सुपरस्टार जब असली जंग—वोट की जंग—में उतरते हैं, तो उनके लिए पहला पड़ाव अक्सर चुनौतीपूर्ण साबित होता है। इस बार खेसारी लाल यादव और रितेश पांडे को हार का सामना करना पड़ा, वहीं पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह भी तीसरे स्थान पर सिमट गईं। यह परंपरा नई नहीं है—मनोज तिवारी और रवि किशन जैसे बड़े नाम भी अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हार से ही करते आए हैं।

आइए, जानते हैं भोजपुरी सुपरस्टार्स की वे कहानियाँ जिनमें पहली हार ही उनकी राजनीति का पहला अध्याय बनी।

खेसारी लाल यादव उर्फ शत्रुघ्न यादव: पहली लड़ाई, पहली हार

भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव ने इस बार आरजेडी के टिकट पर छपरा से चुनावी मैदान में कदम रखा। स्टारडम और भारी भीड़ के बावजूद वे बीजेपी की छोटी कुमारी से करीब 7,600 वोटों के अंतर से हार गए। पहली राजनीतिक पारी का यह नतीजा निश्चित रूप से निराशाजनक है, पर राजनीति में यह सिर्फ शुरुआत है।
भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के अन्य सितारे भी इसी राह से गुज़रे हैं। हार से सीखकर आगे बढ़ना—यही राजनीति का पहला सबक है।

मनोज तिवारी: हार से दिल्ली की सत्ता तक

‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ जैसे सुपरहिट देने वाले मनोज तिवारी ने 2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर गोरखपुर से राजनीति में एंट्री की थी। लेकिन योगी आदित्यनाथ जैसे दिग्गज के सामने उन्हें बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा।
यह हार उनकी तैयारी थी उस सफर की, जिसने 2013 में उन्हें बीजेपी और 2014 में दिल्ली की उत्तर-पूर्व सीट से लोकसभा तक पहुँचा दिया।
तीन बार के सांसद और दिल्ली बीजेपी का प्रमुख चेहरा बनने तक का सफर उसी शुरुआती हार से होकर निकला।

रवि किशन: गलत शुरुआत, सही दिशा में वापसी

भोजपुरी सिनेमा के लोकप्रिय चेहरों में शुमार रवि किशन ने 2014 में कांग्रेस के टिकट पर जौनपुर से चुनाव लड़ा और हार गए। बाद में उन्होंने स्वीकारा कि कांग्रेस जॉइन करना उनकी राजनीतिक भूल थी।
2017 में बीजेपी से जुड़ने के बाद उनका वास्तविक राजनैतिक उदय शुरू हुआ। 2019 में उन्होंने गोरखपुर से जीत हासिल की और 2024 में भी यह सफलता दोहराई।
एक हार ने उन्हें नई दिशा दी—और यह दिशा सही साबित हुई।

दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’: आजमगढ़ की लंबी लड़ाई

‘निरहुआ रिक्शावाला’ फेम दिनेश लाल यादव ने 2019 में आजमगढ़ से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा, पर अखिलेश यादव के सामने हार गए।
लेकिन निरहुआ ने हार को अंत नहीं माना। 2022 के उपचुनाव में उन्होंने वापसी की और जीत हासिल की।
हालांकि 2024 में वे फिर से धराशायी हुए, पर उनकी राजनीतिक सक्रियता इस बात का संकेत है कि वे इस जंग से अभी पीछे हटने वाले नहीं।

पवन सिंह: विवादों, हार और फिर राजनीतिक वापसी का सफर

‘पावर स्टार’ पवन सिंह की राजनीतिक यात्रा बेहद उतार-चढ़ाव वाली रही है। 2024 में आसनसोल से बीजेपी उम्मीदवार बनाए गए, लेकिन विवादों के कारण टिकट वापस लेना पड़ा। इसके बाद उन्होंने बिहार की काराकाट सीट से निर्दलीय लड़ाई लड़ी, मगर हार गए।
मई 2025 में ‘एंटी-पार्टी एक्टिविटी’ के आरोप में बीजेपी ने उन्हें निकाल दिया, पर लोकप्रियता और दबदबे की वजह से अक्टूबर 2025 में अमित शाह की मौजूदगी में उनकी पार्टी में वापसी हो गई।
यह उनके राजनीतिक करियर का अहम मोड़ साबित हुआ।

रितेश पांडे: जन सुराज और करगहर में निराशाजनक प्रदर्शन

जन सुराज पार्टी के साथ चुनावी मैदान में उतरे भोजपुरी सिंगर रितेश पांडे करगहर सीट से लड़े, लेकिन 7.45% वोटों के साथ वे भी हार की सूची में शामिल हो गए।
यह जन सुराज पार्टी के लिए भी बड़ा झटका रहा, क्योंकि 238 सीटों पर लड़ने के बावजूद पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी।

भोजपुरी सितारों का राजनीतिक सफर: ग्लैमर से ज्यादा ज़रूरी है ग्राउंड कनेक्शन

भोजपुरी सितारों की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं—उनके गाने और फिल्में गांव-गांव तक अपनी छाप छोड़ते हैं। लेकिन राजनीति की दुनिया मंचीय करिश्मे से नहीं, बल्कि ग्राउंड कनेक्शन, स्थानीय मुद्दों, संगठन की समझ और लंबी रणनीति से चलती है।
इसी कारण ज्यादातर भोजपुरी सितारों का पहला अनुभव हार से भरा होता है।
पर एक पैटर्न साफ दिखता है:
पहली हार → पार्टी बदलाव/रणनीति सुधार → राजनीतिक उभार

यह बताता है कि स्टारडम सिर्फ शुरुआत देता है, सफलता धैर्य और सीख से मिलती है।

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