भयंदर:तेरापंथ भवन टेंबो रोड, भयंदर में आज पर्युषण पर्व पर वाणी संयम दिवस मनाया गया ! साध्वी बोधि प्रभाजी ने ओ जैन धर्म के तीर्थंकर मेरा प्रणाम लो , तुम सत्यम शिवम् सुंदरम वंदन स्वीकार लो ! जन्म दुखम जरा दुखम यानी जन्म,रोग,बुढ़ापा दुख है, तो हम लक्ष्य निर्धारित करते है की दुख से मुक्त होकर सुखी जीवन जी सके । व्यक्ति धर्म ध्यान में लीन होकर जीवन से जुड़ जाता है और वो आध्यात्म साधना के ज्ञान को सीखने का प्रयास करता है ! आचार्य श्री तुलसी ने कहा एक नया पैसा भी नहीं आएगा तुम्हारे साथ में इसलिए आप संयम के मार्ग पर चले ! कहते है सुख में सब यार होते है, दुख में सब दूर (लाचार) होकर व्यवहार नहीं रखते ! उसके बाद कन्यामंडल द्वारा मंगलाचरण में “मौन की महिमा अपरंपार ,वाणी का माधुर्य बनेगा मौन का श्रंगार” अच्छी प्रस्तुति दी ! साध्वी विनित यशाजी ने फरमाया “जो हर लेते है सबको उसे कहते है वाणी” कैसे बनाए उसे कल्याणी, जरूरत है वाणी के संयम प्रयोग की ! कब बोलना, कितना बोलना उसका विवेक रखना चाहिए , छोटी छोटी असत्य बात का वाचन कर कर्मो का बंधन नही करे हो सके तो मधुर भाषा बोलकर मधुर बनने का प्रयास जरूर करे ! हम अपने वचन को स्वाध्याय में लगाकर हमारी आत्मा को निर्मल बनाए , हमे मौन भोजन करते समय, चलते समय, दिव्य आत्म के संपर्क के समय मौन रहना चाहिए ताकि लड़ाई जगड़ा न होकर बात नही बिगड़े ! भाषा का विवेक हम कर लेंगे तो वाणी के संयम को हम जीत सकेंगे , मौन असांत मन को विश्राम देता है जिससे मौन रहकर विचारो पर संयम कर सके !
साध्वी पुण्य यशाजी ने भगवान महावीर की आत्मा के 7 वें भव को पूरा कर महावीर की 8 वें भव में मनुष्य भव में प्रवेश हुए पर विस्तार में मृगा रानी ने सात स्वप्न देखे उसका वांचन किया ! मौन के साथ कषाय वाणी का त्याग साधना का एक रूप है !
मधुरभाषी बन जग को अपना बनाना , वाणी पर संयम रख आज पुण्य कमाना है !
मौन का अर्थ है वाणी की पूर्ण शान्ति । ओर शान्ति में वह शक्ति है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ने में सार्थक सिद्ध होती है। मौन का अर्थ केवल चुप रहना नहीं है। मौन एक गहरी साधना है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की परतों को हटाकर अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय प्राप्त करता है। मौन अपने भीतर के सौन्दर्य और गहराई को निहारने की एक अनूठी प्रक्रिया है। वाणी से व्यक्ति के चरित्र की पहचान होती है ।
मधुर वाणी ही व्यक्ति का सही श्रृंगार है ।
मोनिका पारस जी भंडारी के आठ की तपस्या है और आगे के भाव है पुण्य यशाजी ने तपस्वी का अभिनंदन किया !













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