डेस्क : संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरिष परवथानेनी ने “पीसबिल्डिंग एंड सस्टेनिंग पीस” विषय पर आयोजित बहस को संबोधित करते हुए कहा कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में दीर्घकालिक शांति की सफलता के लिए राष्ट्रीय स्वामित्व और संस्थागत लचीलापन (इंस्टिट्यूशनल रेज़िलिएंस) को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन द्वारा सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा जानकारी के अनुसार, राजदूत परवथानेनी ने पीसबिल्डिंग कमिशन (पीबीसी) की वार्षिक बैठक में भाग लिया। यह बैठक संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण संरचना के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित “पीसबिल्डिंग वीक” के दौरान हुई। उन्होंने कहा कि शांति निर्माण प्रक्रिया “मांग-आधारित होनी चाहिए और इसका आधार राष्ट्रीय स्वामित्व होना चाहिए”, जबकि साझेदारी विश्वास, गरिमा और समानता पर आधारित होनी चाहिए तथा इसे दाता–ग्राही दृष्टिकोण से आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि वास्तविक शांति निर्माण की कसौटी यह है कि यह देशों की संस्थागत क्षमता और प्रशासनिक मजबूती को कितना सुदृढ़ करता है। साथ ही उन्होंने दोहराया कि भारत, शांति निर्माण और शांति स्थापना के संदर्भ में महिला, शांति और सुरक्षा (विमेन, पीस एंड सिक्योरिटी) एजेंडा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
महासभा की बहस के दौरान राजदूत परवथानेनी ने पीसबिल्डिंग कमिशन के 19वें सत्र में हुई प्रगति की सराहना की। उन्होंने शांति निर्माण संरचना की चौथी समीक्षा के सफल समापन और पहली राष्ट्रीय शांति निर्माण रणनीति प्रस्तुत किए जाने को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। साथ ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पीसबिल्डिंग फंड के लिए 5 करोड़ डॉलर के आकलित योगदान को मंजूरी दिए जाने का स्वागत किया।
हालांकि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण वित्तीय व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर चिंता भी जताई। उन्होंने महासचिव की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पिछले तीन वर्षों में स्वैच्छिक योगदान में लगातार गिरावट आई है, जबकि संगठन की चल रही तरलता (लिक्विडिटी) समस्या ने आकलित योगदान की उपलब्धता को भी सीमित किया है।
उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बीच प्रभाव बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि धन का प्राथमिक उपयोग संघर्षोत्तर (पोस्ट-कॉन्फ्लिक्ट) परिस्थितियों में किया जाए और फंड की आगामी रणनीति में इस दिशा में और ठोस प्रगति हो।
राजदूत ने जोर देकर कहा कि प्रभावी शांति निर्माण के लिए पारंपरिक दाता–ग्राही मॉडल से आगे बढ़ना होगा और इसे इस तरह तैयार करना होगा कि यह संबंधित देशों की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप हो। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका केवल वित्तीय और तकनीकी सहयोग तक सीमित रहनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि शांति निर्माण का मूल आधार संस्थागत मजबूती और राष्ट्रीय क्षमता का विकास होना चाहिए, और यही दीर्घकालिक शांति का वास्तविक मार्ग है।
अंत में उन्होंने भारत की महिला, शांति और सुरक्षा एजेंडा के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि हाल ही में भारतीय सेना की मेजर अभिलाषा बराक को वर्ष 2025 का ‘मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर’ चुना जाना इस प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा कि भारत शांति निर्माण के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा करने और वैश्विक साझेदारों के साथ सहयोग के लिए सदैव तैयार है।













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