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समतामूर्ति, अहिंसामूर्ति, दयामूर्ति, क्षमामूर्ति व शांतिमूर्ति हो साधु : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

समतामूर्ति, अहिंसामूर्ति, दयामूर्ति, क्षमामूर्ति व शांतिमूर्ति हो साधु : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

50वें दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष के छहदिवसीय कार्यक्रम का चतुर्थ दिवस 

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
May 20, 2024
in आराधना-साधना
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समतामूर्ति, अहिंसामूर्ति, दयामूर्ति, क्षमामूर्ति व शांतिमूर्ति हो साधु : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
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समतामूर्ति, अहिंसामूर्ति, दयामूर्ति, क्षमामूर्ति व शांतिमूर्ति हो साधु : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
जालना:जन-जन को सन्मार्ग दिखाने वाले, जनता को मानवता का पाठ पढ़ाने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के 50वें दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष की सम्पन्नता का छहदिवसीय कार्यक्रम भव्य रूप में महाराष्ट्र के जालना की धरा पर स्थित श्री गुरु गणेश तपोधाम परिसर में समायोजित हो रहा है। आचार्यश्री के जन्मोत्सव, पट्टोत्सव सहित दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष के आयोजन में चतुर्विध धर्मसंघ ही नहीं, अपितु अन्य जैन एवं जैनेतर समाज के लोग भी मानवता के मसीहा के प्रति अपनी भावांजलि दे रहे हैं। इतना ही नहीं, राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी को वर्धापित करने के लिए गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी उपस्थित हो चुके हैं।
आचार्यश्री महाश्रमणजी के 50वें दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष के चौथे दिन के समारोह भी संयम समवसरण में भव्य रूप में समायोजित हुआ। निर्धारित समयानुसार युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी संयम समवसरण में पधारे व मंगल महामंत्रोच्चार किया। इसके साथ ही चतुर्थ दिन के कार्यक्रम का शुभारम्भ हो गया। मुमुक्षु राजुल खांटेड़, श्री नितिन नौलखा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्री कनभ पगारिया व तेरापंथ किशोर मण्डल-जालना के सदस्यों ने अपने-अपने गीत का संगान किया। जालना तेरापंथ कन्या मण्डल ने अपनी प्रस्तुति दी।
श्री वर्धमान स्थानकवासी श्रमण संघ के संत पदमऋषिजी महाराज ने भी आचार्यश्री महाश्रमणजी के 50वें दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष की सम्पन्नता पर अपने भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा कि हम बड़े सौभाग्यशाली हैं कि आचार्यश्री महाश्रमणजी जैसे महासंत व महापुरुष के दर्शन व उनके मंगल प्रवचन को श्रवण करने का सुअवसर मिला है। वर्तमान में हमारे भगवान आचार्य ही होते हैं। आप में छत्तीस ही गुण प्राप्त होते हैं। आपका वात्सल्य व आशीष प्राप्त कर मैं स्वयं को बहुत धन्य महसूस कर रहा हूं।
तदुपरान्त महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ व विशाल जनमेदिनी को अपनी मंगलवाणी से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि साधु जीवन प्राप्त होना बड़े भाग्य की बात होती है। एक पुण्य होता है और दूसरा क्षयोपशम होता है। पुण्य से भी कुछ प्राप्त हो जाता है और क्षयोपशम से भी कुछ प्राप्त होता है। पुण्य भी अपने आप में भाग्य और क्षयोपशम भी भाग्य है। पुण्य भौतिक भाग्य व क्षयोपशम आध्यात्मिक भाग्य होता है। पुण्य से जो प्राप्त होता है, वह त्याज्य होता है और क्षयोपशम से जो प्राप्त होता है, वह मोक्ष प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ाने में योगभूत बनने वाला हो सकता है। अध्यात्म की साधना का रसिक व्यक्ति को पुण्य की कामना नहीं करनी चाहिए।
भौतिक दुनिया का सबसे बड़ा पद यदि चक्रवर्ती है तो आध्यात्मिक दुनिया का सबसे बड़ा पद तीर्थंकर का होता है। चौबीस तीर्थंकर प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी में होते हैं। यह दुनिया कभी भी तीर्थंकरों के विरह से युक्त नहीं होती। तीर्थंकर की प्राप्ति भी पुण्य से होती है, इसलिए साधक को तीर्थंकर पद प्राप्त करने की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए। आचार्य का स्थान क्षयोपशम से जुड़ा हुआ लगता है। पुण्य का योग भी आचार्य के साथ जुड़ा हुआ हो सकता है। साधकों को क्षयोपशम की कामना करने का प्रयास करना चाहिए। नव तत्त्वों में पुण्य भी एक तत्त्व है और संवर-निर्जरा भी तत्त्व है। साधक को संवर और निर्जरा को साधने का प्रयास करना चाहिए। संवर-निर्जरा की कामना करने से कभी मोक्ष की प्राप्ति भी संभव हो सकती है। जब तक पुण्य कर्म बंधे रहेंगे, तब तक मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती। इसलिए साधक को पुण्य की नहीं, क्षयोपशम की कामना करने का प्रयास करना चाहिए।
अनंत जन्मों के बाद तो दुर्लभ मानव जीवन प्राप्त होता है और यदि उसमें भी साधुत्व की प्राप्ति हो जाए तो बहुत बड़ी बात होती है। साधुत्व के आगे दुनिया की समस्त भौतिक संपदाएं मानों तुच्छ होती हैं। साधुत्व को अंतिम श्वास तक सुरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में कैसी भी परिस्थिति आए, कभी शरीर भी छूट जाए, किन्तु साधुत्व न छूटे, ऐसा प्रयास करना चाहिए। साधुत्व को शुद्ध रूप पालन करने का प्रयास करना चाहिए। साधु को सभी स्थितियों, परिस्थितियों में समता रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु समतामूर्ति, अहिंसामूर्ति, दयामूर्ति, क्षमामूर्ति व शांतिमूर्ति हो। साधुपन अच्छा पलता है तो मोक्ष की प्राप्ति अवश्य हो सकती है। इसलिए साधु का पहला कर्त्तव्य है कि साधु अपने साधुत्व की सुरक्षा करे। आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज स्थानकवासी साधु-साध्वी भी आए हैं। हमारे में मैत्री भाव बना रहे। हमारी अध्यात्म की साधना अच्छी चलती रहे। गृहस्थों में समता भाव व शांति का विकास होता रहे।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त सकल जैन श्रीसंघ-जामनेर के लार्ड गणेशा स्कूल के चेयरमेन श्री अभय बोहरा, श्रीचन्द्रप्रभु मूर्तिपूजक जैन समाज की ओर से श्री दीपक मोदी, जैन यूथ के प्रेसिडेंट श्री श्रीपाल मरलेचा, भारतीय जैन संगठना-महाराष्ट्र के सचिव श्री अभय सेठिया, वारकारी संप्रदाय की ओर से श्री हरिभक्त परायण डॉ. नन्दकिशोर उमले, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जिला संघचालक डॉ. नितिन खण्डेलवाल, व्यापारी महासंघ की ओर से श्री विनित साहनी, माहेश्वरी समाज की ओर श्री कमलकिशोर मालपानी, दिगम्बर समाज की ओर से श्री माणकचंद कासलीवाल व वर्धमान स्थानकवासी श्रावक संघ की ओर से डॉ. धर्मचंद गादिया ने अपने विचार व्यक्त किए। श्रमण संघ की साध्वी दर्शनाजी ने गीत का संगान किया।
आचार्यश्री ने जालना के विभिन्न संगठनों को आशीष प्रदान करते हुए कहा कि जालना में हमारा आना हुआ। जालना में मेरे से संबंधित अनेक दिवस आए हैं और आने वाले हैं। आज भी तेरापंथ से इतर वर्गों के व्यक्तियों द्वारा विचार व्यक्त किए गए। यह सद्भावना है। सभी गृहस्थों के जीवन में सद्भावना, कार्य में नैतिकता और जीवन पर्यन्त नशामुक्तता रहे। जीवन अच्छा रहे, गृहस्थ जीवन में भी चित्त समाधि रहे, धर्म के पथ पर चलते रहें।
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