जयपुर : निर्माण नगर स्थित संबोधि सभागार में आयोजित प्रवचन सभा में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने धर्म, आत्मशुद्धि और जीवन मूल्यों पर गहन आध्यात्मिक उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि आत्मा की पवित्रता के लिए सरलता अत्यंत आवश्यक है। सरल जीवन से ही मनुष्य आंतरिक शुद्धता को प्राप्त करता है और जहाँ शुद्धता होती है, वहीं धर्म का वास्तविक निवास होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिकता का प्रथम लक्षण सरलता ही है।
मुनि श्री ने आगम वाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि सरलता सद्गति का मार्ग प्रशस्त करती है, जबकि कुटिलता मनुष्य को दुर्गति की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि साधु जीवन सरलता की जीवंत प्रतिमूर्ति होता है, जिसका आचरण पूर्णतः निष्कपट और पवित्र होता है। मनुष्य को स्वयं सरल जीवन अपनाना चाहिए और अपने आचरण से दूसरों को भी सत्य एवं नैतिकता के मार्ग पर प्रेरित करना चाहिए, न कि किसी को असत्य या छल के लिए बाध्य करना चाहिए।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने कहा कि सरलता ऐसा गुण है जो सभी को प्रिय होता है। सरल व्यक्ति समाज में सहज ही सम्मान और स्नेह प्राप्त करता है। लेकिन लोभ, लालच और स्वार्थ के कारण मनुष्य इस गुण को बनाए रखने में असफल हो जाता है। उन्होंने कहा कि सरलता मानव जीवन का सर्वोच्च गुण है और यही वास्तविक मानवता का आभूषण है। सरल व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में सुंदर और संतुलित जीवन जीता है। उन्होंने सभी को जीवन में सरलता अपनाने की प्रेरणा दी।
प्रवचन से पूर्व मुनिश्री ने महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल के विद्यार्थियों को सुसंस्कार, नैतिक मूल्यों और ध्यान-योग की शिक्षा दी। इस दौरान विद्यार्थियों को ध्यान एवं योग के व्यावहारिक प्रयोग भी करवाए गए। इस अवसर पर विद्यालय की शिक्षिकाएँ भी उपस्थित रहीं।
कार्यक्रम के अंत में तीर्थंकर सुमतिनाथ जी की स्तुति का सामूहिक गान हुआ। इसके साथ ही प्रेक्षाध्यान एवं प्रत्याख्यान का क्रम संपन्न हुआ। जयघोष और मंगल पाठ के साथ आध्यात्मिक कार्यक्रम का समापन हुआ।












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