लाडनूं : तेज आतप बरसाते हुए सूर्य को ढंक कर आसमान में छाए बादलों से हुई बरसात और तेज हवाओं ने गर्मी से लोगों को राहत दिला दी है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी मंगलमयी वाणी से लोगों के आंतरिक आतप को हरकर कहीं अधिक राहत प्रदान कर रहे हैं। तभी तो मौसम की प्रतिकूलता के बाद भी श्रद्धालु अपने आराध्य की मंगलमयी वाणी का श्रवण करने के लिए नियमित रूप से उपस्थित हो रहे हैं।
रविवार को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालु जनता को आज के निर्धारित विषय ‘लोक में शांतिकर्ता शांति’ के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि इस भरतक क्षेत्र में चौबीस तीर्थंकरों की व्यवस्था है। महाविदेह तीर्थंकरों से रिक्त नहीं होता। भरतक क्षेत्र का समय बिना तीर्थंकरों के भी व्यतीत होता है। तीर्थंकर और आचार्य में एक बड़ा अंतर यह होता है कि तीर्थंकर किसी के मनोनीत अधिकारी नहीं होते, जबकि आचार्य तो किसी के उत्तराधिकारी के रूप में होते हैं। तीर्थंकर अपने कर्तृत्व व पुण्यवत्ता से तीर्थंकरत्व को प्राप्त करते हैं। वर्तमान में अवसर्पिणी काल गतिमान है। कालचक्र तो मानों अविराम चलता ही रहता है।
काल का अपना क्रम चल रहा है। वर्तमान में चौबीस तीर्थंकर पूर्व में ही हो चुके हैं। इन चौबीस तीर्थंकरों में सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ हुए। दुनिया में दो पद बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। पहला चक्रवर्ती का पद और दूसरा तीर्थंकर का पद। ये दोनों पद मानों दो धु्रव हैं। दोनों में साम्य भी हो सकता है। दोनों की पुण्यवत्ता होती है। चक्रवर्ती भौतिकता की दृष्टि से सर्वोच्च होते हैं आध्यात्मिकता की दृष्टि से तीर्थंकर से बड़ा कोई नहीं होता।
दोनों ही पद सर्वोच्च हैं। धर्म जगत से तीर्थंकर से बड़ा धर्म का प्रवक्ता संभवतः कोई नहीं। तीर्थंकर भगवान को आगम की आवश्यकता नहीं होती। आगमों की अपेक्षा तो साधु-साध्वियों को हो सकती है। तीर्थंकर की वाणी ही आगम बन सकती है। उनको कोई किताब देखने की आवश्यकता नहीं होती, वे सहज रूप में सर्वज्ञ होते हैं। तीर्थंकर प्रभु सर्वद्रष्टा होते हैं। भगवान शांतिनाथ एक ही जन्म में चक्रवर्ती भी बने और तीर्थंकर पद पर भी विराजमान हो गए। इतनी भौतिकता पास में होने पर भी उनका त्याग कर तीर्थंकरत्व को प्राप्त कर लिया, यह बहुत बड़ी बात है। वे अपनी आत्मा के कल्याण के लिए संयम और साधना में लग गए।
इससे सभी को यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि एक समय तक आदमी चाहे किसी भी उच्च पद रहे और कुछ भी करे, एक समय बाद अपनी आत्मा के कल्याण के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। भगवान शांतिनाथ चक्रवर्ती बनकर जनता व मानव समाज की सेवा की। भगवान शांतिनाथ ने चक्रवर्ती पद का त्याग किया तो तीर्थंकर पद को प्राप्त हो गए। आदमी को यह ध्यान देना चाहिए त्याग करने से शांति की प्राप्ति हो सकती है। अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं, धन, पद, प्रतिष्ठा आदि का त्याग कर दे तो उसे शांति की प्राप्ति हो सकती है। इसलिए चारित्रात्माओं को अपने जीवन में त्याग की साधना को अधिक से अधिक बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।












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