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विद्वत व दार्शनिक रूप में प्रतिष्ठित परम पूज्य महाप्रज्ञजी : शांतिदूत महाश्रमण

तेरापंथ के दसवें अनुशास्ता के 105वें जन्मदिवस पर आचार्यश्री ने अर्पित की भावांजलि 

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
July 3, 2024
in राज्य-शहर
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नंदुरबार: वर्ष 2024 के चतुर्मास के डायमण्ड व सिल्क सिटी के रूप में सुविख्यात सूरत की ओर गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार को लगभग 16 किलोमीटर का प्रलम्ब विहार कर महाराष्ट्र के धुळे जिले की सीमा को अतिक्रांत कर नन्दुरबार जिले में पावन प्रवेश किया। पहाड़ी और घाटी मार्ग पर प्रलम्ब विहार कर आचार्यश्री नन्दुरबार जिले के पानबारा गांव में स्थित शासकीय माध्यमिक आश्रमशाला में पधारे। जहां उपस्थित विद्यार्थियों, आश्रमशाला के मुख्य अध्यापक सहित अन्य लोगों ने आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया। गुजरात की सीमा में प्रविष्ट होने में अभी भले ही कुछ दिन शेष हैं, किन्तु उत्साही सूरत व गुजरात के श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूज्य सन्निधि में उपस्थित होकर सेवा का लाभ उठा रहे हैं और वे मानों अपने राज्य, जिला, शहर, नगर व गांव में पूज्यप्रवर को ले जाने को उत्कंठित नजर आ रहे हैं।
बुधवार को प्रातः दहिवेल से युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना संग मंगल प्रस्थान किया। मानसून का दौर, आसमान में दौड़-भाग करते बादल, सूर्य की अनुपस्थिति, बहती शीतल बयार और राजमार्ग के दोनों ओर स्थित पहाड़ों पर छाई हरियाली तथा खेतों में लहराती कृषकों की मेहनत किसी भी प्रकृति प्रेमी को लुभा रहे थे। राजमार्ग आरोह-अवरोह से युक्त था, किन्तु प्राकृतिक अनुकूलता भी थी, किन्तु आज महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी महाश्रम करते हुए लगभग सोलह किलोमीटर का विहार कर थे। इस प्रलम्ब विहार के दौरान आचार्यश्री ने महाराष्ट्र के धुळे जिला की सीमा को अतिक्रांत कर महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में प्रविष्ट हुए तथा अपनी धवल सेना संग पानबारा गांव में स्थित शासनकीय माध्यमिक आश्रमशाला में पधारे।
आज आषाढ़ कृष्णा त्रयोदशी थी तो प्रातःकाल के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के दशमानुशास्ता, प्रेक्षा प्रणेता आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का 105वां जन्मदिवस भी था। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि इच्छा को आकाश के समान अनंत कहा गया है। जिस प्रकार आकाश को कोई अंत नहीं होता, उसी प्रकार इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता। इच्छाएं भी दो प्रकार की होती हैं- एक अच्छी इच्छा होती है तो दूसरी बुरी इच्छा भी होती है। अध्यात्म के पथ पर आगे बढ़ने की इच्छा हो जाए तो जीवन का कल्याण हो सकता है।
आज आषाढ़ कृष्णा त्रयोदशी है। आज के दिन वि.सं. 1977 में 104 वर्ष पूर्व राजस्थान के टमकोर नामक गांव में एक बालक का जन्म हुआ। अपने जन्म के 11वें वर्ष में ही अध्यात्म में रमण करने की इच्छा हुई और साधुता का जीवन स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही उनकी माताजी ने भी साधुता का जीवन स्वीकार कर लिया। पूज्य कालूगणी द्वारा दीक्षित होने वाले मुनि थे नथमलजी (टमकोर)। जो बाद में तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें अनुशास्ता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आज आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का 105वां जन्मदिवस है। दीक्षित होने के बाद वे शिक्षित भी हुए। मुनि अवस्था में उनकी ख्याति विद्वत और दार्शनिक के रूप में होने लगी थी। आचार्यश्री तुलसी के आचार्यकाल में उनका अनेक रूपों में विकास हुआ। उन्होंने ज्ञान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया। परम पूज्य गुरुदेव तुलसी ने तेरापंथ धर्मसंघ में जितने भी नए उन्मेष किए, उनमें आपका भी अच्छा सहयोग था। संस्कृत भाषा का अध्ययन विशेष था। अपने जीवन के 59वें वर्ष में वे युवाचार्य बने। सुजानगढ़ में मर्यादा महोत्सव के अवसर आचार्यश्री तुलसी ने अभूतपूर्व कार्य करते हुए अपने युवाचार्य अर्थात् मुनि नथमलजी (टमकोर) को आचार्य पद प्रदान कर दिया। यह तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास की अद्वितीय घटना थी।
परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के साथ मुझे भी मुनि काल, युवाचार्य काल व आचार्यकाल में निकट रहने व सेवा का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी वत्सलता और कृपा प्राप्त हुई, उन्होंने मुझे कितना आगे बढ़ाया। मैंने उनकी ही इंगित से श्रीमद् भगवद्गीता व जैन आगम पर अनेक भाषण दिए तो बाद में पुस्तक रूप में भी प्रकाशित हो गई। सुखी, सम्पन्न बनो और विजयी बनो। उनका व्यवहार शालीनता व शिष्टता से युक्त था। कायोत्सर्ग, ध्यान, खान-पान की उनकी अपनी जीवनशैली थी। उनका कितना समय योग, आसन, ध्यान, साहित्य सृजन, लेखन, पठन, पाठन आदि में लगता था। आज उनका 105वां जन्मदिवस है। आज के अवसर पर मैं उनको श्रद्धा के साथ वंदन व स्मरण करता हूं।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आश्रम शाला के मुख्याध्यापक श्री रघुवेल गावीत ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।
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